Monday, January 21, 2008

एक याद


एक याद है खुशबू जैसी भीनी-भीनी धुँधली-धुँधली,

एक याद है आँसू जैसी रुकी रुकी सी गिरती गिरती,

एक याद साँसो जैसी है आती जाती घङी घङी,

एक याद आँखों जैसी है, खुली खुली सी मुँदी मुँदी।

एक याद है बादल जैसी,बरस गई टकराकर जो,

एक याद गंगाजल जैसी,पावन मन में आकर जो,

एक याद रातें बरसाती, बिजली संग डराकर जाती,

एक याद तूफान बाद दिन, फिर निकला मुस्काकर जो।

एक याद है रिश्तों जैसी, जुङे हुए पर टूटे से,

एक याद है किश्तों जैसी, बँधे हुए न छूटे से,

एक याद नानी का किस्सा,थोङा झूठा थोङा सच्चा,

एक याद वो साफ बहाने, सच भी लगते झूठे से।

एक याद रह रह कर आती, एक दफन है सीने में,

एक याद कुछ कह कर जाती,एक लगी मुँह सीने में,

एक याद जो हर पल रहती, हर पल 'मुझे भुला दो' कहती,

एक याद है 'रुपक' जैसी,आँसू धुले पसीने में।

रुपेश पाण्डेय'रुपक'

Wednesday, January 16, 2008

विडंबना



हमें जिसकी दिल से फिकर है,उसको अपनी कोई कदर नहीं,
जिसे अपनी दिल से फिकर है,उसकी हमें ही कोई कदर नहीं
ये बङी अजीब सी बात है कि वो राह अब तक साफ है,
जहाँ रहगुज़र को सूकून है,जहाँ मुश्किलों की बसर नहीं।
जहाँ शामियाने तने हुए,वहाँ धूप में भी है शाम सी,
पर बेखबर वो उधर गया,जहाँ शाम होती सहर नयी।
जिसे रात लगती है मौत सी,जिसे खौफ लगती है चाँदनी,
डरकर अँधेरे में जा छुपा,कि किसी को आए नज़र नहीं।
जिसे प्यार से नफरत है, जिसको गुरेज़ इश्क के ज़िक्र से,
वही गमज़दा पकङा गया,वही सोया रात भर नहीं।
वो नहीं हुज़ूम पसंद,उसका सुकून आलम-ए-तख्लिया,
मुझे मुस्कराता दिखा था तब, जब उमङ पङा था शहर कहीं।
जो बङे आज़ाद ख्याल हैं, जिन्हें हर रसम पे सवाल है,
उन्हें बस इसी का मलाल है,सभी एक सोच के सर नहीं।
ये नकाबपोश जहान है,हर शक्ल-ओ-शख्स महान है,
यहीं छोङ सारा हिसाब चल,'रुपक'सिफर के सफर कहीं
रुपेश पाण्डेय 'रुपक'

Wednesday, January 9, 2008

ध्वजा थमा दो हाथ में



ध्वजा थमा दो हाथ में शिखर का शंखनाद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
हो रक्त स्वेद भाल में न छल न भेद चाल में ,
कपाल में हो कँपकँपी रहे रुधिर ऊबाल में
निढाल जो पडा मिलूँ उछाल उन्माद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
गरज रहे हों मेघ वेग वायु का प्रचण्ड हो ,
घमण्ड हो सुपात्र का न पत्र,पात्र,दण्ड, हो,
उदण्ड ही मुझे कहो नमन न धन्यवाद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
कदम हो कण्टकों को कण्ठ को गरल वमन मिले,
अगन मिले बदन को मन को लक्ष्य का दमन मिले,
वसन मिले जो मखमली ,पटक के पंक गाद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
टपक रहा हो स्वेद रिस रहा हो रक्त घाव से ,
अलाव से चिपक के चूस लूँ अगन मैं चाव से
जो भाव भक्ति से भरुँ तो कर्म का प्रसाद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
सशक्त हो सके भुजा,सूर्य को ढँके ध्वजा सजा गगन का थाल हो
हो कर्ण भेद शंख का,बजा सकेगा शक्ति से "रुपक" को शंख नाद दो।
ध्वजा थमा दो हाथ में शिखर का शंखनाद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो……
रुपेश पाण्डेय "रुपक"

बोलो बनोगे पागल


बोलो बनोगे पागल ? दुनिया को 'ना' बोलोगे??
मुश्किल बङा कहना है,कुछ अलहदा कहना है,
सहना हज़ारों फिकरे ,फिर फिक्र क्या,कहना है।
अनजान राहें चुनकर,'जाना कहाँ' 'बोलोगे?
बोलो बनोगे पागल ? दुनिया को 'ना' बोलोगे??

खामोशियाँ सुनना है,तन्हाईयाँ चुनना है,
बुनना सजीले सपने,और भीङ में गुमना है,
घर न जहाँ हो उसको 'अपना ज़हाँ 'बोलोगे?
बोलो बनोगे पागल ? दुनिया को 'ना' बोलोगे??

जो सोच से बाहर हो,सर्वोच्च से ऊपर हो,
बढकर हर एक अचरज से,हर मोह से सुंदर हो,
ऐसी किसी दुनिया का,'मैं मुस्तफा' बोलोगे?
बोलो बनोगे पागल ? दुनिया को 'ना' बोलोगे??

वो जो गया दुत्कारा,जो हो गया आवारा,
मारा गया जो बेदम,जो चुप खङा बेचारा,
ऐसे किसी दोषी को 'रुपक''भला' बोलोगे?
बोलो बनोगे पागल ? दुनिया को 'ना' बोलोगे??

Tuesday, January 8, 2008

युवा


अग्नि से अगन,नदी से धार माँगते युवा,
हो चुका बचाव,अब प्रहार माँगते युवा।
धैर्य धर्म धर चुके,कर चुके कर-याचना,

कर चुके कटाक्ष,कष्ट,कण्टकों का सामना,
दब रही पुकार तो हुंकार माँगते युवा।

हो चुका बचाव अब प्रहार माँगते युवा।
एक पंथ,एक राह,एक लक्ष्य,एक मन,

अब नहीं रहा ये प्रश्न-ए-जीवनमरण
मोङ पर विचार कर पुकार माँगते युवा।

हो चुका बचाव अब प्रहार माँगते युवा।
बाहुबल मनस पटल सभी तरह समर्थ हैं

आज के युवा अबूझ गुत्थियों के अर्थ हैं,
एक है 'रूपक' यहाँ, हज़ार माँगते युवा....
अग्नि से अगन,नदी से धार माँगते युवा,

हो चुका बचाव अब प्रहार माँगते युवा।
'रूपक'
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