Friday, February 29, 2008

मज़ा आ रहा है,

पलक दर पलक कुछ नया आ रहा है,
बदलने दो जीवन मज़ा आ रहा है,
कभी जो किताबों में किस्से पढे थे,
पलटते-पलटते, पलटते बङे थे,
खङे थे कभी जो पहाङों के ऊपर,
अचानक ज़मीं पर वो औंधे पङे थे,
हद-ए-मोङ पर रास्ता आ रहा है,
बदलने दो जीवन मज़ा आ रहा है।
कई रास्ते जैसे हों पटरियाँ,
कई साँप जैसी हैं पगडण्डियाँ,
बताया हुआ है कोई रास्ता,
कोई ऎन मौके पे खोजा हुआ,
कोई ढूँढता ढूँढता आ रहा है ,
बदलने दो जीवन मज़ा आ रहा है।
लकीरें हथेली पे लिक्खी हुईं,
लकीरें जो माथे पे सिकुङी हुईं,
लकीरें कुरेदी हुईं पत्थरों पर,
लकीरें समंदर पे मिटती हईं,
लकीरों में हर दायरा आ रहा है,
बदलने दो जीवन मज़ा आ रहा है,
कोई वक्त के साथ चलता हुआ,
किसी हाथ से वो फिसलता हुआ,
निकलता हुआ उससे आगे कोई,
किसी आँख में वक्त ठहरा हुआ,
हर एक वक्त 'रुपक' तेरा आईना है,
बदलने दो जीवन मज़ा आ रहा है।
पलक दर पलक कुछ नया आ रहा है,
बदलने दो जीवन मज़ा आ रहा है..
रुपेश पाण्डेय'रुपक'


Thursday, February 28, 2008

बहादुरः भाग २

.....मेरा एक जैसी चीनी शक्ल वाला भ्रम तो टूट चुका था और काफी अच्छी पहचान हो चुकी थी बहादुर से,फिर एक दिन पापा का ट्रांस्फर हो गया और हम पास के शहर में चले गये, बात आयी गयी हो गयी, मैं हर सप्ताहांत घर जाता,वो मेरा इंजीनियरिंग का आखिरी साल था, एक दिन अचानक ही, सुबह जॉगिंग करते वक्त बहादुर टकरा गया, कोने मैं उदास सा बैठा बीङी फूँकता,मैंने रुक कर पूछा तो उसने उदासी छुपाते हुए भी वही मुस्कान बिखेर दी, पता चला बीवी गुज़र गयी , और दो बच्चों की परवरिश और काम की कमी ने उसे तोङ कर रख दिया था,मैं उसे घर लेकर गया, माँ ने भी हालचाल पूछा, हमें एक आदमी की तलाश थी जो घर के रोज़ाना के काम कर सके, बहादुर के लिए ये वैसा ही था जैसे किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर को लोन बेचने के काम में लगा दो , पर मजबूरी इंसान से क्या नहीं करवाती,वैसे तो बहादुर का काम बाज़ार या बागवानी का ही था पर घर के बाहर बने सर्वेण्ट क्वार्टर में रहने की वज़ह से एक चौकीदार की कमी भी पूरी कर देता वो, बच्चों को गाँव भेज दिया और रोज़ी रोटी कमाने में लग गया,... चुनाव सर पर थे नेता बरसाती मेंढकों की तरह गली गली मँडराना और टर्राना शुरु कर चुके थे,कॉलेज में भी चुनाव के एक हफ्ते पहले छुट्टी कर दी गई और मैं घर आ गया।छुट्टियों ठीक बाद इम्तहान थे सो मज़े करने की ज़्यादा गुंजाईश न थी,हमारे शहर में उस दिन चुनाव होना था, मम्मी पापा सुबह ही वोट देकर आ गये थे और हम लोकतांत्रिक अवकाश का आनंद ले रहे थे,टी वी पर सुबह से ही चुनाव हावी था, आखिरी के आधे घण्टे बचे थे, ठीक 4:30 PM, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई, एक आदमी भरी धूप में कंबल ओढे आया था, मुझे कुछ शक हुआ पर मेरे कुछ भी समझने के पहले तीन और आदमी घर में आ धमके और कङी लगा दी,उनके हाथ में लोहे के बक्से थे, समझते देर न लगी कि ये 'बूथ केप्चरिंग' करके भागे हैं, अंदर आते ही उन्होंने मोर्चा सँभाल लिया,मम्मी और पापा को अलग अलग कमरों में बंद किया और मुझे लगा दिया चाय पानी में, टी वी में एक्ज़िट पोल आ रहे थे, उनमें से एक जो उनका लीडर लग रहा था हँसा और बोला-"ये क्या भविष्यवाणी करेंगे,भविष्य तो हमारे पास बंद है इन पेटियों में..." फिर ज़ोर के ठहाके शुरु हो गये, मैं कोई तरकीब सोच रहा था इनसे छुटकारा पाने की, पारकिंसन लॉ याद आ रहा था"work strteches according to time...something like this. " मेरा दिमाग एक्सप्रेस की तरह चल रहा था, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई, ठहाकों की आवाज़ बंद हो गई, उनमें से एक ने मेरी कनपटी पर बंदूक रखी और दरवाज़ा खोलने को कहा, बोलने की ज़रुरत नहीं थी कि जो भी था उसे टरकाना था, दरवाज़ा खोलते ही 'शलाम शाब' की आवाज़ आयी,मानो भगवान ने बहादुर के रुप में देवदूत भेज दिया हो,मेरे पास सिर्फ तीस सेकण्ड का वक्त था, मेरा दिमाग तेज़ी से चलने लगा,मैंने बहादुर को बोला-'आज चारों पेटियाँ आ गई हैं,आज तुम गुप्ताजी की दुकान में ही रहो,वो हिसाब कर देंगे" और मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया , बहादुर ने क्या समझा क्या नहीं पता नहीं पर बदमाशों ने उसके जाते ही मुझ पर धावा बोल दिया-"बोल कौन सी पेटी??" मैंने आँगन में रखी अमरुद की चार पेटियाँ दिखा दीं, बोला वो किसान है, गुप्ता जी उसे पैसे देंगे, वो कुछ संतुष्ट दिखे तो मेरी जान में जान आयी पर अभी कुछ पता नहीं था बहादुर को क्या समझ आया, वैसे भी उसकी हिंदी ज़रा कमज़ोर ही थी,पर एक भाषा होती है आँखो की जो सारे शब्दों से प्रबल और स्पष्ट होती है,जैसे भूखे बच्चे की बोली उसका रोना है जो शब्दों का मोहताज नहीं,संकट की इस घङी में भी मैं फिलॉसॉफी झाङ रहा था यह सोचकर मुझे बरबस हँसी आ गई,उधर बाहर बहादुर उलझन में था-"ये कैशा बर्ताव किया शाब ने? क्या बोल रहे थे? कौन शी पेटी?"वो गुप्ता जी की दुकान में जाकर बैठ गया, गुप्ता जी राजनीति के खासे शौकीन आदमी थे, पेट चलता था किराने की दुकान से पर साँसे चलती थी राजनीति की उठापटक के साथ, गुप्ता जी ठहरे एक पार्टी के कट्टर समर्थक सो ये तो सहज था कि सब काम छोङकर वो लगे होंगे एक्जिट पोल के परिणाम देखने में, बस यहीं मेरा दिमाग चल गया और एक दाँव खेल दिया, बहादुर परेशान सा पहुँचा गुप्ता जी की दुकान में, उसने पूछना चाहा कि कौन सा हिसाब करना है? पर गुप्ता जी तो गङे हुए थे टी वी में, तभी अचानक टी वी पर ब्रेकिंग न्यूज़ आया कि फलाँ बूथ में बूथ केप्चरिंग हो गई है,चार पेटियाँ गायब हैं,बहादुर का माथा ठनका कहीं.....वो भागा मकान की ओर, बङे दिनों के बाद उसे अपने मन का काम करने का मौका मिला था , किसी की रक्षा करने का काम, अपनी स्वामी भक्ति दिखाने का काम, अपने हुनर के मुताबिक वो मोहल्ले के गली गली चप्पे चप्पे से वाकिफ था, उसने पीछे की दीवार फाँद कर घर के अंदर प्रवेश किया, उसने कुछ आवाज़ें सुनी झाँक कर देखा तो उसका शक यकीन में बदल गया,आहट सुनकर मेरा ध्यान उस ओर गया तो बहादुर की छाया देख मेरा साहस चार गुना बढ गया, तभी उनमें से एक ने मुझे किचन से पानी लाने को कहा , मैं ऐसे ही किसी मौके की तलाश में था, अंदर मैंने पहले ही जाल बिछा रखा था, गैस पर कङाही में तेल गर्म हो रहा था, टेबल फैन के सामने एक प्लेट में लाल मिर्च पावडर रखा जा चुका था,और अब बैक अप भी आ चुका था, मैंने प्लान के मुताबिक किचन के सारे बरतन गिरा दिये , आवाज़ सुनकर उनका एक साथी उठा और किचन की ओर भागा, दरवाज़ा खोलते ही उसे लाल मिर्च पावडर का स्वाद चखना पङा, वो बिलबिलाता हुआ बाहर की ओर भागा, बाकि तीन सतर्क हो गये,एक ने बंदूक के साथ दरवाज़े पर चोट की और अंदर दाखिल हुआ, पैर ज़मीन पर बिखरे तेल पर पङे और मौका देखकर मैंने गर्म तेल से उसे स्नान करवा दिया , बस यहाँ मेरा मिशन खत्म हुआ, अगले ही पल मैं रस्सियों से बँधा हुआ कोने पङा था, कितने वार हुए पता नहीं,अचानक सर पर ज़ोर की चोट हुई और मैं बेहोश हो गया,जब आँख खुली तो देखा बहादुर किचन के दरवाज़े के पास खङा हुआ था , वही चितपरिचित सम्मोहित कर देने वाली मुस्कान लिये,मैं खुश होकर उसकी ओर बढा रास्ते में, तीन बदमाश चित पङे थे , हमारी जीत हो चुकी थी, मैंने खुशी में बहादुर को ताली दी पर ये क्या़!!!......बहादुर ज़मीन पर गिर पङा!!!मुस्कान कायम थी, उसकी पीठ पर छः इंच लंबा चाकू धँसा हुआ था,उसके पीछे चौथा बदमाश भी ढेर पङा था, बहादुर ने अपना काम पूरा कर दिया था,मैं जहाँ था वहीं जम सा गया,भाव हीन सा , तभी शायद शोर सुनकर पङोसियों ने दरवाज़ा तोङ दिया,मम्मी-पापा बाहर आ चुके थे और मुझे दिलासा दे रहे थे, जाने क्या क्या गतिविधियाँ चल रही थी कुछ पता नहीं, मेरी आँखो के सामने बहादुर के चलचित्र घूम रहे थे,उसकी वो मुस्कान जो मौत भी उससे छीन न सकी,........एक ज़ोर की सीटी की आवाज़ से मेरी तंद्रा टूटी, देखा चार बज चुके थे, बाहर कङाके की ठण्ड में एक और बहादुर पहरा दे रहा था,ताकि हम चैन से सो सकें,मेरा मन आदर से भर गया,मुझे मेरे ही शब्द याद आ गये 'ये चीनी शक्ल वाले एक ही साँचे में ढले होते हैं, एक ही फैक्टरी में बने होते हैं' और अगले ही पल मैनें खुद से कहा "इनकी शकलें न सही पर अदम्य साहस,ईमानदारी, और समर्पण एक ही साँचे में ढला है, एक ही फैक्ट्री में बना है...."
रुपक

Tuesday, February 19, 2008

बहादुर


रात के घुप्प अंधेरे में जब दूर तक कोई हलचल न हो रही हो, कुछ हवाऐं थक कर सो गई हों और कुछ मानो नटखट सहेलियों की तरह जाने क्या बतियाती दबी आवाज़ में ठिठोली करती हों,पत्ते की हल्की सरसराहट मानो माँ की तरह डपट रहीं हों, दूर से आती कुत्तों की हूँक,रात के सम्मोहन को भंग करती, मानो शांत जल में एक वलय बना और वहीं लुप्त हो गया , लगता जैसे प्रर्कति के ये काले धूसर रंग भी कल्पना का कितना सुंदर संसार रच सकते हैं,दूर से आती नींद की परी जैसे सारे संसार में निद्रा रस बिखेर रही हो....तभी अचानक किताबों के पन्ने बार बार मेरे बालों पर चोट करने लगे मैं निढाल सा पङा नींद की परी के आगोश मैं जा रहा था और.... फिर वही आवाज़ ,रात के अंधेरे को चीरती,सारे सम्मोहनों को भंग करती,अंततः मेरे कान के परदों तक आ पहुंची , झटके से नींद टूटी तो देखा टेबल घङी के काँटे नब्बे अंश का कोण बना रहे थे 3:00 AM!! मैंने चौंक कर देखा और सर पकङ कर बैठ गया , उठकर गैस पर चाय रखी और हाथ में किताब लेकर पन्ने पलटने लगा-"तीन चेप्टर्स, और..सिर्फ तीन घण्टे!!" तभी फिर वही कर्कश आवाज़ पर इस बार उसको धन्यवाद करने को जी चाह रहा था,मैंने बङे से मग में चाय भरी टेंशन मैं टेबल की और बढा किंतु इस बार उसी कर्कश सीटी की आवाज़ के साथ डण्डे की आवाज़ ने मेरा धैर्य तोङ दिया ,यकायक ध्यान उसी पुरानी घटना की तरफ चला गया जिसे मैं कम से कम इस वक्त तो याद नहीं करना चाह रहा था। 'बहादुर' नाम था उसका, उसके इसी नाम के चार भाई और हैं ऐसा उसने बताया था ,माँ बाप ने ये नाम नहीं रखा, कब पङा याद नहीं, लोगों ने कभी नाम पूछना भी नहीं चाहा बस शक्ल देखी और बोल दिया 'बहादुर' उसने कभी विरोध नहीं किया, "क्या फर्क पङता है शाब नाम कुछ भी हो और.. वैशै भी मेरा अशली नाम ज़रा मुश्किल है...", मेरी ज़िद पर उसने बताया पर मैं एक बार भी न दोहरा सका।हमारे जीवन मैं कई ऐसी घटनाएं होती हैं जिनके होने का एहसास भी हम लंबे समय तक नहीं कर पाते,हमारे लिए वो छोटी और बेमानी होती हैं, और एक दिन अचानक वो हमारे सामने आकर खङी हो जाती हैं,चौंकाती हुई,या डराती हुई, पर ये घटना कुछ अलग थी 'मुस्काती' हुई, मेरा उससे पहला परिचय तब हुआ जब वो मेरे जीवन का अठारह साल तक हिस्सा रह चुका था, बात कुछ अजीब थी पर सच, 'बहादुर' सोसाईटी का वाचमैन, पेहले वो पगार पर था, पिछले साल सोसाईटी की अंदरुनी कलह की वजह से वो भंग हो गई और साथ ही बहादुर की नौकरी भी गई, पर बरसों के लगाव और पेट की भूख ने नया रास्ता खोज लिया, रात भर चौकीदरी और घर घर से महीने में एक बार पैसे लेना, काम में वो पक्का ईमानदार था इसका गवाह मैं रह चुका था,मेरा इंजीनियरिंग का वो पहला साल, और वो पहला एक्ज़ाम जब साल भर की मस्ती ने नाकों चने चबवा दिए थे, रात भर जागकर पढने के अलावा कोई चारा न था और वो मेरा पहला अनुभव था बहादुर की मौजूदगी के एहसास का,रात की नींद और पढाई की ज़ंग में बहादुर की हर घण्टे आती सीटी और डण्डे की आवाज़ मेरे लिए अलार्म का काम करती,जब मैं पहली बार उससे मिला भरोसा करना मुश्किल था कि ये वही सीटीधारी-डण्डापटक प्राणी है जिसकी एक आवाज़ बङे बङों का दिल दहला दे, बमुश्किल 5ft कद, छोटी आँखे,मानो रात भर जागने के लिए ही बनाया हो भगवान ने, और वो मुस्कान, मानो उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा हो,वो मुस्कान जो मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गई,दुख सुख,पाने खोने से परे ,सबके लिए एक जैसी, खुशबू की तरह बिखरती, किसी संक्रामक रोग की तरह फैलती,"शलाम शाब" उसके पहले दो शब्द, पापा ने हाथ मे पाँच का नोट पकङाया बोला जाकर दे दो, मुझे कम लगा पर पापा ने कहा,नहीं सब इतना ही देते हैं,मैंने झिझकते हुए उसे पाँच का नोट पकङाया और उसने लाखों की मुस्कान बिखेर दी, पहली बार उसे एक अलग व्यक्ति की तरह देखा अब तक मेरा विश्वास था कि 'ये चीनी शक्ल वाले एक ही साँचे में ढले होते हैं, एक ही फैक्टरी में बने होते हैं'। ऐसे हुआ मेरा पहला परिचय बहादुर के साथ,मुझे इंतज़ार रहता हर महीने उसके आने का, मैं अपनी पॉकेट मनी से 5 रु मिला देता, आखिर मेरे कई पेपर्स तो उसकी वजह से ही अच्छे गये थे,उसकी मुस्कान मेरे लिए टॉनिक का काम करती,सारा दिन खुशनुमा गुज़रता, उसके बाद तो वो कभी किसी चाय की दुकान,कभी सङक पर टकरा ही जाता, हाथ सहसा सर पर चला जाता उसका और वही 'शलाम शाब' वही मुस्कान , मैं चाह कर भी कभी मना न कर सका उसे हर वक्त ऐसा करने से , क्योंकि 'शलाम' और मुस्कान साथ ही कार्य करते थे और मुस्कान मैं नकारना नहीं चाहता था, धीरे धीरे बहादुर का घर आना जाना नियमित होने लगा, माँ कभी उसे बाज़ार से सब्ज़ी लाने का काम दे देती ,कभी बागवानी का,बहादुर भी खुशी खुशी करता ,पहली बार जब माँ ने उसे पैसे देने चाहे उसने मना किया, फिर माँ ने समझाया कि ये समाज सेवा का काम परिवार वालों का नहीं, उसके परिवार के बारे में पूछा तो वो शरमा गया, "जी मेम शाब,उशको भी ले आया हूँ,वैशे शशुर जी का खेती का काम भी मैं देखता हूँ" ये शायद उसका सबसे लंबा वार्तालाप था मेरी जानकारी में, नार्थ ईस्ट में कहीं महिला परिवार की मुखिया होती हैं और शादी के बाद मर्द उनके ही घर में रहते हैं ऐसा मैंने कभी पढा था, मैं अपने स्टडी रुम गया और मैप पर नार्थ ईस्ट ढूँढने लगा...


क्रमशः..

Monday, February 18, 2008

कहने को , जश्न-ए-बहाराँ है


कुछ नाम ऐसे होते हैं जो स्वयं में एक संस्था बन जाते हैं, कारण बेशक उनका उत्क्रष्ट प्रदर्शन ही होता है, किंतु इनका कद इतना ऊँचा हो जाता है कि उम्मीद से कम कुछ भी सहन नहीं होता चाहने वालों को, सिनेमा जगत में ऐसे कुछ नाम हैं,मणि रत्नम, संजय लीला भंसाली, नागेश कुकनूर, और आशुतोष गोवारीकर, इसे संयोग कहें या कुछ और पर मणि रत्नम को छोङ बाकि तीनों ही निर्देशक अपनी साख के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाये पहले साँवरिया, फिर 'बाँम्बे टू बैंकाक' और अब 'जोधा अकबर'..सबसे पहले तो आशुतोष को सैकङों बधाईयाँ जिन्होंने ऐसा विषय चुना जो भारतीय सिनेमा में कमाई के नज़रिये से बहुत ही कम सफल हो सका है, ध्यान दिया जाए तो मुगल-ए-आज़म के बाद शायद ही कोई ऐतिहासिक प्रष्ठ भूमि पर बनी फिल्म सफलता के परचम गाङ पाई है, बीच में कुछ छोटी मोटी कोशिशें सफल हुईं जैसे '1942..a love story' या 'लगान' किंतु ये भी इतिहास के इर्द गिर्द रची गईं प्रेम कथायें ही थीं,जब विदेशी फिल्मकार 'Gladiator''Troy'' जैसी कालजयी फिल्में बनाते हैं हम तारीफें करते नहीं थकते किंतु भारतीय सिनेमा में बात पेङों के ईर्द गिर्द ही घूमती रह जाती है,ऐसे में 'फराह खान' और 'एकता कपूर' जैसी कुछ महान हस्तियाँ आम दर्शकों का वास्ता देकर ऐसा मायाजाल बुनती हैं कि दर्शक उसके आगे कुछ सोच ही न पायें,और जब तक उनकी आँख खुले ये अपनी झोलियाँ भरकर निकल लें,और जब भारतीय सिनेमा पीछे मुङकर देखे तो 37 साल बाद भी वही एक नाम ज़ुबाँ पर आए 'शोले',इस नज़रिये से सोचा जाए तो 'जोधा अकबर' वास्तव में एक ईमानदार कोशिश है,फिल्म इतने बङे पैमाने पर रची गई और इतने घटनाक्रमों में बुनी गई कि शायद अपना ही बोझ सह न पाई,इतिहास की नींव पर गढी,राजनीति की ईंटों पर बनायी , संबधों के सीमेण्ट से जुङी कहानी है 'जोधा अकबर';मैंने इसे एक अलग द्रष्टिकोण से देखने का प्रयास किया है,चार अलग अलग काल्पनिक चरित्र हैं, अपने आस पास से ही लिए गये चरित्र, विकास जो मेरा सहकर्मी है अभी२ शादी कर के लौटा है और उसके लिये 'जोधा अकबर' अपने पार्टनर के साथ अच्छा समय बिताने का मौका है, शर्मा जी जो इतिहास के अध्यापक हैं वो पूरी तैयारी से आये हैं फिल्म की चीर फाङ करने के लिये, रमेश जो ऑटो चलाता है और ऐश्वर्या का बहुत बङा फैन है उसने भी स्टाल की टिकट जुगाङ ली है और बङी उम्मीदों से आया है, आदर्श जो कला में रुचि रखता है और अच्छी फिल्मों का प्रशंसक भी है,तो फिल्म शुरु होती है,और बाकियों के साथ ये चारों भी अपनी २ उम्मीदों के साथ हाल में प्रवेश करते हैं,शुरुआत होती है कुछ ऐतिहासिक तथ्यों से , शर्मा जी ये पार्ट मिस नहीं करना चाहते यहाँ आशुतोष ने समझदारी के साथ सिर्फ कुछ आधारभूत तथ्य ही बताए, जैसे बैरम खान का अकबर के गुरू की तरह युद्ध लङना,पनीपत का युद्ध , हेमू कालानी की पराजय,शर्मा जी ज़्यादा गल्तियाँ निकाल नहीं पाये, रमेश को इतिहास की थोङी जानकारी हो गई पर वो इंतज़ार में था ऐश्वर्या के आने के,विकास अपने पार्टनर को अपने आधे अधूरे इतिहास की जानकारी से प्रभावित करने में लगा था, आदर्श को छायांकन पसंद आया और फिल्म सही ट्रैक पर जाती दिखी,इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ स्टारिंग का पहले रितिक फिर ऐश, पूरा हाल तालियों और सीटियों से गूँज उठा, शर्मा जी उदासीन रहे, रमेश की खुशी का ठिकाना नहीं था, विकास भी चुपचाप फिल्म में मग्न हो गया, आदर्श भी आनंद ले रहा था, कुछ तथ्यों और कुछ कल्पना पर रची कहानी आगे बढने लगी, घटनाक्रम रोचक और तेज़ होने लगे,शर्मा जी ने खुलकर गल्तियाँ पकङीं, रमेश को मज़ा आ रहा था क्यूंकि ऐश यहाँ मात्र शो पीस नहीं थी फिल्म की जान लग रहीं थी वो, और राजपूत राजकुमारी का किरदार बखूबी निभाया उन्होंने, रितिक भी उन्नीस नहीं रहे, कुल मिलाकर कास्टिंग इतनी ज़बरदस्त थी कि आधी फिल्म तक दर्शक कलाकारों और भव्य सेट के आकर्षण से ही बाहर नहीं आ पाये, शर्मा जी को छोङ दें तो बाकि लोग इण्टरवल तक खुश ही थे,लेकिन इण्टरवल के बाद फिल्म धीरे २ फिसलने लगी, 'अज़ीमो-शान शहंशाह' गाना जितना भव्य बनाया गया उतना ही अवास्तविक, लंबा और बोरिंग लगा, और उस गाने के बाद तो मानो आशुतोष भी थक गये, इसके बाद फिल्म की रफ्तार एकदम कम हो गई साथ ही बीच २ में आनेवाले गाने पूरी तरह बेवज़ह लग रहे थे, ड्रामा हद पर तब पहुँचा जब जंग के मैदान में जोधा भी जा पहुँची ये कितना सच है कितना नहीं ये तो इतिहासकार ही जानें लेकिन एक आम मासाला फिल्म की तरह पूरी स्टरकास्ट जंग के मैदान में जमा हो गई, फिर वही गोद में मरने वाले सीन, रोना बिलखना, अकबर का शहंशाह न रहकर रितिक बन जाना , बचकाना लगा, विकास ने भी फिल्म पर ध्यान छोङकर फिल्म के बाद की प्लानिंग शुरु कर दी, रमेश को फिल्म पूरी पैसा वसूल लगी, और वो अंत तक नज़र गङाये देखता रहा बल्कि अब मज़ा आ रहा था कि फिल्म ज़्यादा समझ आ रही है, आदर्श की प्रतिक्रिया मिश्रित रही, पर हाँ ये तय हो गया कि चालीस करोङ की लागत से बनी फिल्म इतिहास रचने नहीं जा रही है,बस एक फिल्म है, आशुतोष को फिर भी सलाम इस हिम्मत के लिये, और वैसे भी स्वदेस जैसी फिल्म बनाकर जिसने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा दी हो उसके लिये कुछ गल्तियाँ हमेशा मुआफ हैं, एक बार ज़रुर देखें, फिर चाहे हुज़ूम में जाएं या तख्लिया।
रुपक

Tuesday, February 12, 2008

काल के कपाल पर...


काल के कपाल पर निशान माँगता मिला,

'हल' पटक के 'हल' कोई किसान माँगता मिला;

हाथ हाथ से मिले ,मगर वो कौम बन गये,

जो जुङे थे शक्ति को,विरक्ति को उफन गये,

चमन हुए उजाङ,झाङ द्रोह के उगे वहाँ,

जहाँ थी चाह वस्त्र की, शस्त्र और कफन गये।

शब्द तीर वो लिए, कमान माँगता मिला।

काल के कपाल पर निशान माँगता मिला,

'हल' पटक के 'हल' कोई किसान माँगता मिला।

हाङ-माँस का शरीर , वर्ग-वर्ण बन गया,

दर्द से डिगा नहीं, कथन से भाल तन गया,

बन गया असत्य तथ्य,दुर्दशा दिशा बनी,

'समूह' 'झुंड' बन गया, 'बयान' बन 'वचन' गया,

चला था 'घर' की चाह में, 'मकान' माँगता मिला;

काल के कपाल पर निशान माँगता मिला,

'हल' पटक के 'हल' कोई किसान माँगता मिला।

कौन माँग कर रहा? कहाँ पर आग लग गयी,

सिगार सा धुआँ उठा कि बस्तियाँ भभक गयीं,

दुबक गयी है फिर पुकार , हार कर हुंकार से,

पेट हँस रहा, कि भूख किस गली खिसक गयी;

मिट्टी का बुत, अपने लिए मैदान माँगता मिला।

'रुपक' हदों को तोङती,उङान माँगता मिला।

काल के कपाल पर निशान माँगता मिला,

'हल' पटक के 'हल' कोई किसान माँगता मिला।

रुपेश पाण्डेय 'रुपक'
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