Tuesday, March 18, 2008

मैं क्या हूँ?


मंद हुआ कोलाहल, हालाहल मन में भर बैठा हूँ,

जो समक्ष, वो है सक्षम,वो ही उत्तम,तो मैं क्या हूँ?

चढ आया अब तो सूरज सर, परछाईं तक छोटी है,

अब तक तो थी कानाफूसी,प्रखर बात अब होती है,

हर करतल,हर नज़र पूछती,मैं उसका क्या लगता हूँ?

जो समक्ष, वो है सक्षम,वो ही उत्तम,तो मैं क्या हूँ?

वो चिराग है,वो रोशन है, वो कुल की मर्यादा है,

मान बचाकर गिरवी रखा,वो पुरखों का वादा है,

वो उपनाम सँभाले बैठा, नाम लिए मैं बैठा हूँ,

जो समक्ष, वो है सक्षम,वो ही उत्तम,तो मैं क्या हूँ?

वो जिसके हैं पंख,मगर वो आसमान का कैदी है,

जिसकी खुली उङान वहाँ तक, डोर जहाँ तक जाती है,

उसके कारण पंख समेटे, हरदम वापस लौटा हूँ,

जो समक्ष, वो है सक्षम,वो ही उत्तम,तो मैं क्या हूँ?

वो जिसका असतित्व ज़मीं से जुङा हुआ, जङ से पोषित,

वो जिसका दायित्व मुकुट, संबंधों के नग से शोभित,

उसके राजतिलक में जय करती,लाचार प्रजा सा हूँ,

जो समक्ष, वो है सक्षम,वो ही उत्तम,तो मैं क्या हूँ?

एक बार,बस एक बार ,उसको समक्ष से दूर करो,

एक बार उसको निर्बल,मुझको बल से भरपूर करो,

एक बार अवसर दो 'रुपक' ,दिखलाने का कि क्या हूँ,

नाम समाधि पर लिखना, उपनाम चिता को देता हूँ,

जो समक्ष, वो है सक्षम ,वो ही उत्तम,तो मैं क्या हूँ?

रुपेश पाण्डेय ' रूपक'

Monday, March 10, 2008

जोगी आया रे...




"अगर उन्होंने हमारे पास एक फिदायीन भेजा है दिखाने के लिये कि वो क्या हैं,तो हम उनके पास एक इंसान भेजेंगे दिखाने को कि हम क्या हैं"'ब्लैक एण्ड व्हाईट' के अंत में बोला गया ये संवाद फिल्म का सार लगा, कहने को देशभक्ति के पुराने ढर्रे पर ही बनी एक और फिल्म का एक आम संवाद ही है जो सिनेमा हॉल में तालियाँ बजवाने का और एक तत्कालिक मानसिक उत्तेजना पैदा करने का अचूक फॉर्मूला मात्र है, जिसका असर तीन घण्टे से ज़्यादा कभी नहीं होता,80 MM की चौङाई वाले उस अँधेरे कमरे में मन में उपजी रोशनी उस कमरे के बाहर के चकाचौंध कर देने वाले अँधेरे से हारती ही आई है।लेकिन तारीफ की बात ये है कि फिल्म में कहीं भी ग्यान का ओवरडोज़ नहीं है, विचारों को थोपने की कोशिश नहीं की गई, सारे घटनाक्रम इतनी सफाई के साथ बुने गये कि कहीं भी पकङ छूटती नज़र नहीं आती।


हर निर्देशक कभी न कभी कहता सुना जाता है कि बॉक्स ऑफिस का गणित कुछ ऐसा है कि बङे से बङे कलाकारों के पसीने छूट जाते हैं , या तो बॉक्स ऑफिस पर विजय पाकर जनता का दिल जीत लो और आर्थिक रूप से इतने समर्थ हो जाओ कि 'अपनी वाली पिक्चर बना सकूँ' या कला की पूजा के चक्कर में अपने करियर की कुर्बानी दे दूँ, ऐसा बोलने वाले अधिकतर निर्देशक भूल जाते हैं कि न तो 'सफल फिल्म' और 'अच्छी फिल्म' रेल की दो पटरियाँ हैं न ही दर्शक इतने मूर्ख जो कला की कद्र करना न जाने, सुभाष घई ने कभी भी ऐसी कोई लक्ष्मण रेखा खींचने की कोशिश नहीं की और किसी न किसी रुप में संदेश देते ही आए हैं(बिना सफलता से समझौता किये) पर यहाँ एक महान निर्देशक का टच साफ दिखाई दिया है।


मुख्य धारा में आकर बात की जाये तो फिल्म के नाम से उल्टा यहाँ रंगो का ऐसा तानाबान बुना गया है कि आँखो के रास्ते सीधा दिल में उतर जाता है, यदि एक शब्द में परिभाषित करें तो 'ब्लेक एण्ड व्हाईट' के लिये जो शब्द आता है वो है 'मरीचिका', जो नहीं है वो होने का आभास, और जो है उसका एक सुखद आश्चर्य की तरह आना।भावना शून्य चेहरा लिये और आँखो से सैकङों संवाद बोलते नुमैर काज़ी (अनुराग सिन्हा) रणदीप हुड्डा की याद दिलाते हैं, चुलबुली शागुफ्ता(अदिती शर्मा) आँखो से ही सब कुछ बोल जाती हैं , उनके पर्दे पर आते ही अम्रतामयी (अम्रता राव) अनुभूति होती है, कसा हुआ और वास्तविकता की हद तक विश्वसनीय निर्देशन बार बार मणिरत्नम की याद दिलाता है, पर एक पात्र जो किसी के होने का भ्रम नहीं कराता है वो है रंजन माथुर (अनिल कपूर) अनिल ने अभिनय की उन ऊचाईयों को छू लिया है जहाँ वो तुलनात्मक अध्ययन से ऊपर उठ चुके हैं।शेफाली 'सत्या' वाला जादू पैदा नहीं कर पायीं।एक पात्र जिसके ज़िक्र के बिना स्तंभ अधूरा रह जायेगा वो हैं गफ्फार साब (हबीब तनवीर) हबीब जी थियेटर जगत में भगवान की तरह पूजे जाते हैं किंतु रुपहले पर्दे से वो दूर ही रहे हैं, उनकी छोटी किंतु प्रभावित कर देने वाली उपस्थिति बता ही देती है कि वो अभिनय के पितामह हैं।


संगीत ज़रा हटकर और मोहित कर देने वाला है, खास तौर पर 'मैं चला..." अपने शब्दों और फिल्मांकन की वज़ह से बहुत ही सुंदर बन पङा है, गाने सूफियाना मस्ती लिये हुए हैं,रिदम के शौकीनों को वूफर और एम्लिफायर पर एक्सपेरिमेंट करने का पूरा मौका मिलेगा।कहानी बताकर उत्सुकता कम नहीं करूँगा , बस इतना ही कहना है कि यदि वाकई फिल्म देखना मकसद है तो ज़रूर जायें, साथ ही चेतावनी भी कि गर्ल फ्रेण्ड के साथ न जायें,समय और पैसे बरबाद करने के आरोपों के छीटों के साथ,आपके आँसुओं की बूँदाबाँदी पर टिप्पणी होने की संभावना है ,, जो झङप का रुप ले सकती है।

मेरा पसंदीदा द्रश्यः नुमैर के दिमाग की वो उलझन जब वो मिलिंद गुनाजी को पीटते हुए बार बार पूछता है "ज़िहादी कौन?मरने वाला या मारने वाला??" यहाँ सुभाष घई ने गज़ब का सीन बनाया है,नुमैर को मिलिंद की शक्ल में भी अपनी ही शक्ल नज़र आती है, बस वहीं एक फिदायीन मर
जाता है और एक इंसान पैदा हो जाता है।

रुपक

Wednesday, March 5, 2008

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर


पठान के आखिरी ऒवर की चौथी गेंद फेंकने की देर थी कि बस...उसके बाद मैदान और दर्शक दीर्घा में अंतर करना नामुमकिन सा हो गया, 105 करोङ (..और जारी) भारतीयों के गले रुँध गये, कुछ की आँखो की कोरों पर आँसू चिपक गये और कुछ के ढुलक पङे, जोश में मदमस्त किसने कैसी शारीरिक प्रतिक्रिया दी किसे होश था,105 करोङ (..और जारी) भारतीय बंदरों की तरह नाच रहे थे, अब ऑस्ट्रेलियाई मीडिया और खिलाङियों को कौन समझाये कि जनाब बंदर होना या बन जाना कोई शर्म की बात नहीं, जिस 'Monkey Gesture' की दुहाई देकर ऑस्ट्रेलियाई सच्चाई से मुँह मोङते रहे अंत में जाकर उनके ही गले का फंदा साबित हो गया,ऑस्ट्रेलियाई टीम के घंमंड और उसके चकनाचूर होने की कहानियाँ तो अब बरसों तक हिंदुस्तानी बच्चों की लोरी का काम करती रहेंगी, पर गौर करने वाली बात तो ये है कि क्या सायमण्डस समझ पायेंगे भारतीयों के मनोभाव को?या अब भी घमंड और मूर्खता की रेत में सर गङाये, नस्लवादी अवशेष ढूँढते,अपनी संकुचित शतुर्मुर्गी मानसिकता में ही जीते रहेंगे?

हद तो तब हो गयी जब हरभजन ने अपनी बगलें खुजलायीं तो उसे भी नस्लवादी और भङकाऊ करार दे दिया गया, ऑस्ट्रेलिया की पहले फाईनल में हुई हार वहाँ के अखबारों में शोक संवेदना जितना भी स्थान नहीं पा सकी, क्योंकि हरभजन के बगलों की तस्वीरों से ही सारे कोने पटे पङे थे,लगता है वहाँ के पत्रकारों के पास भारतीय मीडिया की तरह 'शर्मनाक हार' 'तू चल मैं आया' 'ताश के पत्तों की तरह ढेर' जैसे शब्द ही नहीं हैं, विश्व विजाताऒं के देश में लाज़िमी भी है, किंतु शायद अब उन्हें आदत डाल लेनी चाहिये।

इस सारे घटनाक्रम का सबसे मज़ेदार पहलू ये रहा कि ऑस्ट्रेलियाई मीडिया और खिलाङी अपने ही चक्रव्यूह में फँस गये, भारत के लिये इसने उल्टा उत्प्रेरक का काम कर दिखाया,और भारतीय टीम ने वो कर दिया जो शायद उन्होनें भी सोचा नहीं होगा।अब इससे ऑस्ट्रेलियाई क्या सबक लेते हैं ये तो आने वाला समय ही बतायेगा,परंतु हरभजन ने पूरे घटनाक्रम का डटकर मुकाबला किया,और जवाब खेल के मैदान पर ही दिया , ये बात भारतीय सहिष्णुता के सिद्धांत को और पुख्ता कर देती है। कोई दो राय नहीं कि हरभजन भी दूसरे मुरली बन गये होते यदि टीम का,बोर्ड का और भारतीय मीडिया का पुरज़ोर समर्थन न मिला होता। दावे के साथ कहा जा सकता है कि भारतीय जीत पर मुरली भी उतनी ही खुशियाँ मना रहे होंगे,क्योंकि ये जीत मानसिक दीवालियेपन पर सहिष्णुता की जीत है, षङयंत्र पर सिद्धांतो की जीत है, मूर्खता पर समझदारी की जीत है।मुरली जैसे महान खिलाङी के कपङे उतरवा कर शरीर पर सैकङों सेंसर फिट कर बॉलिंग एक्शन की जाँच कराने वाले ऑस्ट्रेलियाई स्वयं को विश्व क्रिकेट का सरगना समझ बैठे पर मैदान के बाहर भी वर्चस्व स्थापित करने की कुचेष्टा आत्मघातक साबित हुई। जब भारतीयों को पता चला कि सायमण्डस ने नस्लवाद के आरोप लगाये तो नब्बे प्रतिशत लोग तो यही नहीं समझ पाये कि सायमण्डस कैसे 'निगर' हैं?? फिर विवाद उठाया 'मंकी' होने का, सायमण्डस को कौन समझाये कि बजरंग बली का दर्जा पाना इतना भी आसान नहीं, फिर भी उनका प्रताप देखो कि उनके नाममात्र ने आपको इतनी कीर्ति और यश दे दिया कि 'आई पी एल' के बाज़ार पर आप सबसे ऊँचे दाम पर बिके विदेशी क्रिकेटर बन गये, भारतीय दानवीरता पर न सही अपनी किस्मत पर ही अगर ज़रा भी आश्चर्य हो रहा हो तो एक बार भारत आकर बाजरंग बली का मंदिर ज़रुर घूमें,ताकि आपको भी तो पता चले भारत में 'मंकी' की कितनी इज़्ज़त है,और तब भी समझ न आए तो हनुमान चालीसा में ऐसे ही दिमाग के रोगियों के लिये कहा गया हैः

"जाके बल से गिरिवर काँपे,रोग दोस जाके निकट न झाँपै।" या
"महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवारि सुमति के संगी"
भारतीयों का विश्वास टूटा नहीं ये सोचकर किः"
दुर्गम काज जगत के जेते,सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते"
"संकट कटै मिटै सब पीरा,जो सुमिरै हनुमत बलबीरा"
आखिर भारतीय टीम का यश फैला विदेशी धरती पर और सिद्ध हो ही गयाः
"जय हनुमान ग्यान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर"
रुपक
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