Sunday, June 29, 2008

अवकाश क्यों नहीं लेते तुम?


खिङकी से देखा तो सूरज डूब रहा था पर्वत में;
मैं भागा झटपट उस ओर,सवार हवाओं के रथ में;
रोक कहूँगा आज न जाओ,डर लगता है अँधेरे में;
आज करो आराम,रुको न कुछ दिन मेरे बसेरे में;
कल प्रभात से मैं कह दूँगा,पेट दर्द है लेटे तुम;
कभी कभी कुछ ऐसा कह,अवकाश क्यों नहीं लेते तुम?

मन सूना सूना होता,जब शाम धुँधलका लगता है;
अंबर ताल भरा मोती,आँखो से छलका लगता है;
ठगता है साया तक,लगता जैसे कोई घूर रहा;
लगता चाँद शराबी,सारी रात नशे में चूर रहा;
ऐसे लापरवाह श्रमिक को कार्यभार क्यों देते तुम?
कल प्रभात से मैं कह दूँगा,पेट दर्द है लेटे तुम;
कभी कभी कुछ ऐसा कह,अवकाश क्यों नहीं लेते तुम?

आज डपट कर आएंगे,जब चाँद करेगा मनमानी;
तभी चमक उठना,जब करता हो कोई कारस्तानी;
शैतानी की सज़ा चुकानी होगी उसको ये कहकर;
उम्मीदों से भरा रखेगा,वो हर पल रोशन रहकर;
क्यों शीतल जल छोंक लगाते,इतना तेज समेटे तुम?
कल प्रभात से मैं कह दूँगा,पेट दर्द है लेटे तुम;
कभी कभी कुछ ऐसा कह,अवकाश क्यों नहीं लेते तुम?

मुझे प्रभाकर बोला हँसकर , अब अंबर सिंदूरी है;
समय इशारा करता,मेरा जाना बङा ज़रूरी है;
अंगूरी सपनों के ये फल,नींद खुले पर खट्टे हैं;
खुशियों की डाली पर बैठे,मुश्किल के तिलचट्टे हैं;
उङकर सर पर ही बैठें,गर वक्त रहे न चेते तुम;
'रूपक' पूछ रहा खुद से-"क्या तिलचट्टों के चहेते तुम?"
'रुपक'
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