Saturday, November 14, 2009

प्यारा सा बचपन


लगता है ज्यों कल ही खिला था, बंद कली सा जो सिकुङा था ,
पंखुङियों पर पङी ओस पर, चंचल रविकर चमक उठा था,
सात रंग की विभा समेटे माँ के आँचल में सिमटा था ,
वो मेरा प्यारा सा बचपन, पावस सा लुकता छिपता था।

नहीं मिला जब कोई बहाना,मजबूरी थी शाला जाना,
वहाँ पहुँचकर याद किसे घर, बातें,मस्ती, गाना, खाना,
लेकिन कर्कश घण्टी सुनकर , छङी तले पढना पङता था।
वो मेरा प्यारा सा बचपन, पावस सा लुकता छिपता था।

गल्ती की गुंजाईश भी थी,हल्की सी समझाईश भी थी,
तब अंधी घुङदौङ नहीं थी, अपनी अपनी ख्वाहिश भी थी,
ख़्वाब ख़्वाब जैसा होता था, बचपन बचपन सा दिखता था।
वो मेरा प्यारा सा बचपन, पावस सा लुकता छिपता था।

थोङा चुप रहना सीखा था, पङे वक़्त कहना सीखा था,
ज़िद की हद के अंदर हमने धैर्यवान रहना सीखा था,
नाक-जेब संबंधहीन थे, फिर भी मित्रों का जत्था था,
वो मेरा प्यारा सा बचपन, पावस सा लुकता छिपता था।

जन्मजात अब बच्चे धावक, पालक संज्ञा देते "शावक",
"सीखो नहीं" शिकार करो बस, पर पीङा ही तेरा मानक;
भरी भीङ 'रुपक' ने देखा, हर बच्चा था डरा डरा सा।
उम्मीदों की चिलचिल ग़र्मी पावस का उन्माद कहाँ था,
और मेरा प्यारा सा बचपन, पावस सा लुकता छिपता था।

रुपक

Sunday, August 23, 2009

चलो कमबख़्त हो जायें


हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

हाँ अक्सर 'खूँ' में खौले हैं , शहादत के कई किस्से,
'बनो तारीख़', ऐसी सीख देते , सुरमयी किस्से,
मेरे मक़सद की खिङकी पीट आये फिर वही किस्से,
हमें कर ज़ार देती है , चलो कमबख़्त हो जायें।
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

हमें इन सा नहीं बनना, ये कीङे हैं मकोङे हैं,
हमें इनसाँ नहीं बनना, कई ऐसे निगोङे हैं,
पपीहे प्यास वाले हम, हाँ दरिया हमने छोङे हैं,
नदी दुत्कार देती है, चलो कमबख़्त हो जायें,
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

जी हाँ कुछ नाम लिखे हैं, बुतों,सङकों,मज़ारों पे,
चढे है सूलियों पर,कुछ गङे ज़िंदा दीवारों में,
मगर एक टीस रिसती है, वो पत्थर की दरारों में,
बना अख़बार देती है,चलो कमबख़्त हो जायें।
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

किया हासिल तो फिर क्यों,सिलवटें क़ायम हैं माथे पे,
समाते हाथ में कुछ ही, खुशी गिर जाती लाते में,
नज़र भर हमने लूटी चाँदनी अपने आहाते में,
ये 'रुपक' की चहेती है,चलो कमबख़्त हो जायें,
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

रुपक

Monday, August 17, 2009

बङप्पन बचपनाने लग गया


चटकती चट्टान,चिल-चिल चमकती चिंगारियाँ,
धधकती सी धूप , धूल-धूसरित सी धारियाँ,
चिङचिङा सुनसान रस्ता बङबङाने लग गया,
ग़र्म मौसम धूल से साज़िश रचाने लग गया,
बूँद वाले बारिशी गीले ग़लीचे बिछ गये।
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

आँख के मोती छिटककर बूँद बारिश बन गये,
बेबसी के बहाने फिर छतरियों से तन गये,
सोच का 'आवारापन' जब सर उठाने लग गया,
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

कोरी मिट्टी की महक या बजबजाती नालियाँ,
मूसलों सी धार छप्पर पर बजाती तालियाँ,
भद्र,समुचित,संतुलित जब बङबङाने लग गया,
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

भीग जाने की ख़ुशी,कुछ याद आने की ख़ुशी,
ख़ुद-ग़रज में बुना पिंजङा टूट जाने की ख़ुशी,
ज़िंदगी के गीत 'रुपक' फिर सुनाने लग गया,
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

रुपक

Monday, April 27, 2009

क्यों इतने बेचारे हम?


कभी शराफ़त, कभी मुसीबत,
कभी वक्त़ के मारे हम,
क्यों इतने बेचारे हम?

उहापोह
में फँसे,धँसे उस मोह में जिसका ग्यान नहीं;
कहीं किये समझौते अगणित,बिके कहीं सम्मान नहीं,
बिफरे-बिफरे फिर भी झेलें,थू-थू की बौछारें हम,
क्यों इतने बेचारे हम?

जोख़िम
के डर,हार की दहशत,बदनामी की सिहरन में,
चले वही पथ,जहाँ "ग़नीमत" ;'स्वप्न','श्वास','स्पंदन' में,
जन-समूह में हाथ उठा अब "देखो मुझे" पुकारें हम,
क्यों इतने बेचारे हम?

क्रोध कर दमन,नीलकण्ठ मन,मुख-मण्डल पर शांति विभा,
नग्न प्रदर्शन,है भौंडापन,सीखो 'लज्जा' की प्रतिभा,
दहके भीतर ,हाथ भींचकर, निर्जीवों पर मारें हम।
क्यों इतने बेचारे हम।

परंपरा,परिवार बेङियाँ,संस्कार के हैं ताले,
"कब तक औंधा पङा,इन्हीं का नाम जपेगा रस्साले!!",
आसमान की चाह में पिचके गैस भरे ग़ुब्बारे हम,
क्यों इतने बेचारे हम।

चेहरा लटक पैर तक पहुँचा,चाल अधमरी अनमन सी,
कहीं गंदगी पैठ गयी है, 'चोक' कर रही अङचन सी,
'रूपक' ज़रा ज़ोर तो मारो,झेंलेंगे फ़व्वारे हम,
क्या इतने बेचारे हम?
'रुपक'

Monday, March 30, 2009

भभक उठा जो क्रोध


भभक उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

घमण्ड
है प्रचण्ड,मुण्ड दर्प सर्प कुण्डलित,
लोभ
,मोह,प्राप्ति से हो रहे नयन ललित,
शुचित
लगें सभी उपाय राय की ग़रज नहीं,
गरज
रही है 'एक-क्षत्र राज्य' की ही कल्पना।
भभक
उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त
रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

चक्षु
का अनल,स्वजन को देखकर,धधक रहा,
कथन
से 'नीति','सत्य','व्रत' के;अग्नि घ्रत,भङक रहा,
उचक
रही उद्दण्ता,पावसी-मण्डूक सी,
शौर्यहीन
कर रहा है "युद्ध-युद्ध" गर्जना।
भभक
उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त
रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

लो
प्रहार कर दिया, तार-तार कर दिया,
"मैं अजातशत्रु" सबको ख़बरदार कर दिया,
भर
दिया ज़हर,उमर के बरग़दी लगाव में,
घाव
में उतार आया पीढीयों की वेदना।
भभक
उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त
रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

देखकर पयोधि,दंभ फूट-फूट रो पङा,
कुटैव
में भसम हुआ,किसी को फ़र्क क्यों पङा?
सकल
निशा वो ताकता रहा तरंगरोह को,
अस्थि
पुष्प बह गये, बहा पुष्प प्रेम का।
'रुपक' कटूक्ति त्याग,अब तालाशता प्रियंवदा।
रुपक

Sunday, February 15, 2009

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो



कसमसाहट सी ,खलबली सी है,

शाम फिरसे धुली-धुली सी है,

रूठ कर लापता हुआ है दिन,

रात कर चुगली,अब भली सी है,

ग़म,गिले,गालियाँ,ग़ुबार,गरज;

ग़ल्तियाँ,गाज,गनीमत,ग़फ़लत,

दिल-दबा-तार्रूफ़-ए-ज़ुबाँ तो करो,

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

आज फिर ख़ाक हो गया मक़सद,

और का पाक़ हो गया मक़सद,

नैमतें,नाम,दुआएं लेकर,

ऊपरी ताक हो गया मक़सद।

हो बदी ही सही,अपनी मर्ज़ी का करो
हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

एक सपना हद-ए-नज़र वाला,

एक जज़्बात पुर-असर वाला,

एक हालात जो जन्नत जैसा,

एक बढा हाथ हो मन्नत जैसा,

इनकी तफ़्तीश में,मातम न करो,
हर मकान ओट ढूँढते फिरो।

खूब खायी ख़याल की खिचङी,

ख़्वाब के हर उबाल की खिचङी,

बात से पेट भरा,गफ़लतों की गैस बनी,

हर अधूरे सवाल की खिचङी।

भूख भागेगी,सच का कौर भरो,

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

हम मिसालों के मातहत जीते,

ज़िंदगी काटते फ़क़त जीते,

दासताँ बनने की औकात कहाँ,

दासता की भरे दहशत, जीते।

कर बगावत 'रूपक';पंख आज़ाद करो

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

'रुपक'

Friday, January 30, 2009

जय हो!


ऑस्कर में 10 नामांकन,3 श्रेणियों में किसी भारतीय का नामांकन, 'Slumdog Millionair' ने नये कीर्तिमान रच डाले, 'तीसरी दुनिया' 'पिछङा देश' 'निर्धन' 'निम्न' अकिंचन' हतोत्साहित कर देने वाले संबोधन सुन-सुन कर हम इतने नकारात्मक हो गये कि फिल्म की भारतीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने शुरू कर दिये, देखने के बाद जब लगा कि कहानी तो विशुद्ध भारतीय है तो बात आ ठहरी हमारी छवि को धूल-धूसरित करने के प्रयास पर,आये दिन विवाद होने लगा कि 'निर्धनता' को बेचा जा रहा है,भारतीयों को 'कुत्ता' कहा गया है,'डैनी बॉयल' ने स्पष्टीकरण दिया कि-"जैसे एक कुत्ता आँख मूँदकर शांत पङा रहता है, आने जाने वाले उस पर ध्यान तक नहीं देते, वैसे ही झोपङपट्टी का 'ज़माल' सब देखता,सुनता,अनुभव करता और सँजोता जाता है'।
कुछ लोगों ने 'विरोधियों' के विरूद्ध 'विद्रोह' का झंडा उठा लिया और 'डैनी बॉयल' का स्तुति गान करने लगे, प्रश्न उठा "भारत को भारत की छवि दिखाने के लिये हमेशा एक विदेशी की ज़रूरत क्यों पङती है?"; उदाहरण दिया गया फिल्म 'गाँधी' का; आज़ादी के 35 साल बाद तक किसी भारतीय को गाँधी पर फिल्म बनाने की क्यों न सूझी?
विवादों को परे रखकर प्रार्थना करते हैं कि कुछ 'पुरस्कार' झोली में आ जायें,इतिहास कहता है कि 'गोल्डन ग्लोब' की मुहर लगने के बाद फिल्म समालोचकों की प्रिय हो जाती है,और ऑस्कर की प्रबल दावेदार भी।प्रश्न उठता है सफलता का पैमाना ऑस्कर ही क्यूँ, ऐसा क्या ख़ास है 'ऑस्कर' में? हम क्यों नहीं बना पाते ऐसी प्रतिष्ठा अपने पुरास्कारों की?साल दर साल बढते पुरस्कार समारोह और फूहङ प्रस्तुतिकरण अधोपतन की ओर इशारा कर रहे हैं,विचलित होकर महान निर्देशक 'आशुतोष गोवारीकर' ने एक समारोह में यह प्रश्न उठाया? किंतु हे!टी॰आर॰पी॰ प्रेम़!
'विषय विचलित' 'प्रस्तुतीकरण प्रेमी' मीडिया सारा दिन कुछ चुनिंदा पंक्तियाँ दोहराता रहा खास तौर पर 'साज़िद ख़ान' की अभद्र भाषा, अभद्र्ता बिकाऊ है, शालीनता से सिर दर्द होता है, दर्शकों की दुहाई देकर 'साज़िद' बोल गये कि"मैं उनके लिये ही फूहङ बना हूँ", यहाँ टी॰ वी॰ के सामने बैठे दर्शक बाल नोच रहे थे 'समलैंगिक चुटकुलों' से हतप्रभ,बच्चों और बुज़र्गों के समक्ष किंकर्त्तव्यविमूढ।
सर्वश्रेष्ठ होने की प्रतिस्पर्धा ने बनाये 'पुरस्कार','पुरस्कारों' की विश्वसनीयता से बने 'सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार' अब पुरस्कारों के नाम पर उपजता है विश्वास, DVD के 'कवर पेज' पर लिखा 'ऑस्कर का ठप्पा' भरोसा दिलाता है, चुनाव को सरल बनाता है,वैश्विक स्तर पर ख्याति दिलाता है,इसलिये चिंतित हैं लोग भारत की छवि के बारे में।
'Slumdog Millionair' का 'पैमाना' 'खुला पैखाना' नहीं है,'अंधे-विकलांग बच्चे' चिङियाघरों में नहीं मिलते ये वही हैं जो मुंबई के प्लेटफॉर्म्स पर रोज़मर्रा दिखते हैं पर हम आँख मूंद लेते हैं, नाक बंद कर लेते हैं,सोच संकुचित कर लेते हैं, फिल्म में ये घटनाक्रम का हिस्सा हैं,न कि जबरन फिट किया गया 'आईटम नंबर', फिल्म सहसा ब्राज़ील की प्रष्ठभूमि पर बनी 'सिटी ऑफ गॉड' की याद दिलाती है, फिल्म में बहुत सटीक सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है, पैसों से भरा बाथ टब जहाँ सलीम अपनी अंतिम साँसें लेता है 'परिचय' और 'उपसंहार' की भाँति आता है और सलीम के जीवन का सार दिखाता है 'भौतिक लालसा' ; वहीं ज़मील का जीवन दर्शन 'निष्काम प्रेम' है, लतिका का चेहरा 'लक्ष्य' की तरह प्रयोग हुआ है और बार-२ दोहराया गया है,'करोङपति' का 'शो' एक दक्ष सूत्रधार की भाँति सारे बिखरे द्रश्यों को पिरोता जाता है,सहज अभिनय, कसा निर्देशन,रोचकता,फिल्म को ऑस्कर की श्रेणी में खङा करती हैं।
बस एक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है, क्या सचमुच भारत में आज तक ऑस्कर श्रेणी की कोई फिल्म नहीं बनी?
कटु सत्य निर्वस्त्र ,निर्लज्ज,निर्धन,
'ये तुम हो' की तख़्ती लिये वो खङा है,
'नहीं जानता''कौन हो?''न सताओ़'
शतुर्मुर्ग सा सर ज़मीं में गङा है,
सपनों की तकिया, ख़यालों का बिस्तर,
मुखौटों में सोकर,सुकून सा मिला है,
हमें न दिखाओ कि औकात क्या है,
मशक्कत से रंगीन पर्दा बुना है।
रुपक
Feedback Form
Feedback Analytics