Sunday, February 15, 2009

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो



कसमसाहट सी ,खलबली सी है,

शाम फिरसे धुली-धुली सी है,

रूठ कर लापता हुआ है दिन,

रात कर चुगली,अब भली सी है,

ग़म,गिले,गालियाँ,ग़ुबार,गरज;

ग़ल्तियाँ,गाज,गनीमत,ग़फ़लत,

दिल-दबा-तार्रूफ़-ए-ज़ुबाँ तो करो,

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

आज फिर ख़ाक हो गया मक़सद,

और का पाक़ हो गया मक़सद,

नैमतें,नाम,दुआएं लेकर,

ऊपरी ताक हो गया मक़सद।

हो बदी ही सही,अपनी मर्ज़ी का करो
हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

एक सपना हद-ए-नज़र वाला,

एक जज़्बात पुर-असर वाला,

एक हालात जो जन्नत जैसा,

एक बढा हाथ हो मन्नत जैसा,

इनकी तफ़्तीश में,मातम न करो,
हर मकान ओट ढूँढते फिरो।

खूब खायी ख़याल की खिचङी,

ख़्वाब के हर उबाल की खिचङी,

बात से पेट भरा,गफ़लतों की गैस बनी,

हर अधूरे सवाल की खिचङी।

भूख भागेगी,सच का कौर भरो,

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

हम मिसालों के मातहत जीते,

ज़िंदगी काटते फ़क़त जीते,

दासताँ बनने की औकात कहाँ,

दासता की भरे दहशत, जीते।

कर बगावत 'रूपक';पंख आज़ाद करो

हर मकान ओट ढूँढते न फिरो।

'रुपक'

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