Sunday, August 23, 2009

चलो कमबख़्त हो जायें


हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

हाँ अक्सर 'खूँ' में खौले हैं , शहादत के कई किस्से,
'बनो तारीख़', ऐसी सीख देते , सुरमयी किस्से,
मेरे मक़सद की खिङकी पीट आये फिर वही किस्से,
हमें कर ज़ार देती है , चलो कमबख़्त हो जायें।
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

हमें इन सा नहीं बनना, ये कीङे हैं मकोङे हैं,
हमें इनसाँ नहीं बनना, कई ऐसे निगोङे हैं,
पपीहे प्यास वाले हम, हाँ दरिया हमने छोङे हैं,
नदी दुत्कार देती है, चलो कमबख़्त हो जायें,
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

जी हाँ कुछ नाम लिखे हैं, बुतों,सङकों,मज़ारों पे,
चढे है सूलियों पर,कुछ गङे ज़िंदा दीवारों में,
मगर एक टीस रिसती है, वो पत्थर की दरारों में,
बना अख़बार देती है,चलो कमबख़्त हो जायें।
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

किया हासिल तो फिर क्यों,सिलवटें क़ायम हैं माथे पे,
समाते हाथ में कुछ ही, खुशी गिर जाती लाते में,
नज़र भर हमने लूटी चाँदनी अपने आहाते में,
ये 'रुपक' की चहेती है,चलो कमबख़्त हो जायें,
हकीकत मार लेती है , चलो कमबख़्त हो जायें,
जताकर प्यार 'लेती है' , चलो कमबख़्त हो जायें।

रुपक

Monday, August 17, 2009

बङप्पन बचपनाने लग गया


चटकती चट्टान,चिल-चिल चमकती चिंगारियाँ,
धधकती सी धूप , धूल-धूसरित सी धारियाँ,
चिङचिङा सुनसान रस्ता बङबङाने लग गया,
ग़र्म मौसम धूल से साज़िश रचाने लग गया,
बूँद वाले बारिशी गीले ग़लीचे बिछ गये।
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

आँख के मोती छिटककर बूँद बारिश बन गये,
बेबसी के बहाने फिर छतरियों से तन गये,
सोच का 'आवारापन' जब सर उठाने लग गया,
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

कोरी मिट्टी की महक या बजबजाती नालियाँ,
मूसलों सी धार छप्पर पर बजाती तालियाँ,
भद्र,समुचित,संतुलित जब बङबङाने लग गया,
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

भीग जाने की ख़ुशी,कुछ याद आने की ख़ुशी,
ख़ुद-ग़रज में बुना पिंजङा टूट जाने की ख़ुशी,
ज़िंदगी के गीत 'रुपक' फिर सुनाने लग गया,
फ़र्ज़ में बाँधा बङप्पन बचपनाने लग गया।

रुपक

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