Saturday, January 9, 2010

बेतरतीब


अंगुर-अंगुर, भंगुर-भंगुर, झींगुर-झींगुर झन्नाटा
कतरा-कतरा, पसरा-पसरा,बिखरा-बिखरा सन्नाटा।

बढते-बढते, चढते-चढते, लुङके-लुङके चित्त पङे,
उजले-उजले, पिघले-पिघले, बिखरे-बिखरे चित्र बङे।
पस्त-पस्त फिर सुस्त-सुस्त फिर ज़बरदस्त एक फर्राटा,
कतरा-कतरा, पसरा-पसरा,बिखरा-बिखरा सन्नाटा।

कब? क्यों? कैसे? कितना? कब तक?
किट-किट ,झिक-झिक,झक-झक,बक-बक,
अनदेखी,तिरछी देखी,फिर देखी अपलक टक-टक,
रोता होता सोता सोता, खुली आँख का खर्राटा।
कतरा-कतरा, पसरा-पसरा,बिखरा-बिखरा सन्नाटा।

ढुलका-वुलका,हल्का-हल्का,ढाँढस-वाँढस आशाऐं,
तने-तने,फिर बने-बने, फिर राहें-वाहें भरमाऐं।
चंचल,चतुर,चपल चित चेहरे पर चाहे चित्रित चाँटा,
'रुपक' बेतरकीब , ख़याल अजीब
कि क्यूँ 'बेतरतीब' सा ये लम्हा बाँटा।

अंगुर अंगुर, भंगुर भंगुर, झींगुर झींगुर झन्नाटा
कतरा कतरा, पसरा पसरा,बिखरा बिखरा सन्नाटा।

रुपक

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