Saturday, June 19, 2010

मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल


जज़्बाती बुलबुला गया, नाहक ही चुलबुला गया,
कहने को तिलमिला गया ये दिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

उस ओट में उजास थी , जहाँ अनमनी उबास थी,
बिंदास बदहवास बेमंज़िल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

चंपाकली के गाँव के गुलशन में हैं ग़ुलाब,
तेज़ाब आब हो गई, पानी हुआ शराब,
जुही चाँदनी में जल गई, सूरज में गई खिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

अरमान धूप में पङे,छत पर सुखाते बाल,
मुँह तल्ख़ियों के है दही,ख़्वाहिश बनी कव्वाल,
सब टाँट गाँठ बाँध के जुमला दिया उछाल,
गंभीर,गूढ मंत्रणा,बनवा रही है WILL,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

बत्तिस तरह के टोटके,छत्तिस तरह के डर,
आये न वक़्त लौट के ,चौंतिस दफा़ फ़िकर,
बाइस छटाक के बचे,आधी बची उमर,
चौबीस घण्टियाँ रहे, पच्चीस की कसर,
ताने पचास बार के , सत्रह दफा़ VIGIL,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

रद्दोबदल के दौर,बिछाते हुये लपेट,
जल्दी समेट फ़लसफे़ सब हो रहे हैं लेट,
आये ज़माने TWEET के, पकङे है तू सलेट,
वो पेट पेट ही नहीं जिसकी शकल न NET,
झकलेट! फिर भी आ गया,अनुबंध की चपेट,
'रुपक' हुआ बुरा,लिया चुरा,किया जटिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

जज़्बाती बुलबुला गया, नाहक ही चुलबुला गया,
कहने को तिलमिला गया ये दिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।
'रुपक'

Saturday, June 12, 2010

हीलियम के हम ग़ुब्बारे


काँच,कीलें,पिन नुकीले,धूर्त धरती,छत,दीवारें
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे;

सब हमें ही ताकते हैं,साधते हम पर निशाना,
वो ज़माना लद गया , आसान था जब पार पाना,
जन्म से वो 'खल' मैं 'नायक' , वो 'कमीने' हम 'बेचारे',
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे;
 
साँस तक उनकी विषैली , सुन न लेना बात मैली,
है पहेली चाल उनकी,पुतलियाँ निर्मम कुचैली,
वो सँङाँधी खुले गठ्ठर, हम ज़वाहराती पिटारे,
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे,

कुछ ग़ुब्बारे भी नुकीले,ज़िस्म उग आयी हैं कीलें,
रंग धूसर,सुस्त उङानें,आ के मेरी ख़ाल छीलें,
भयाशंका, दगा़ शंका, हवा की नज़रें उतारें,
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे,

ऐ ग़ुब्बारे फूट जाना, ज़िस्म न पाना नुकीला,
रंग धूसर, सुस्त उङानें, क्षितिज का अरमाँ लचीला,
या कि 'रुपक' उङा करना, आस की डोरी सहारे,
हमको बस दिखते हैं तारे, हीलियम के हम ग़ुब्बारे।
 
रुपक

Friday, June 4, 2010

"मत-लब" की कुछ बात



तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात,
सन्नाटे!भन्नाते रहना, झींगुर वाली रात।
गहन-मनन में शून्य न होगा, होगा एक विचार,
कुंठा का उपचार करेगा,परामर्श का सार,
कुकुरमुते,बुदबुदे न होंगे पल-प्रतिपल जज़्बात;
तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात।

विगत दिवंगत पूज्य न होगा, न 'क्या था' न 'काश',
न ढाँढस का च्यवनप्राश,न धीरज भरी गिलास,
निरा-ढीठ,निर्लज्ज,निरादर कर काढेंगे दाँत;
तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात।

जब निषेध से निर्मम होता जायेगा परिणाम,
तब अंजाम भयंकर,होगा महाघोर संग्राम,
साँप छंछूदर वाले होते जाएंगे हालात;
तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात।

तन्हाई वाले जप-तप में,'रुपक' नहीं समर्थ,
निर्विचार का, निराकार का,बङा गूढ है अर्थ,
अहं 'अहम' बातों का,ये बस है "मत-लब" की बात,
सन्नाटे!भन्नाते रह न! झींगुर वाली रात।
'रुपक'



Feedback Form
Feedback Analytics