Saturday, August 28, 2010

आरज़ू अनंत,मन घुमंत

आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार,
है जो मिला,चलो मिला,न जो मिला,न क्यों मिला?
ख्वाहिशें ज्वलंत,भींचे दंत,कर रहा गुहार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
खोपङी की खाट में विराट जाल बुन गया,
खु़द की सोच सङ गयी,खु़द का मान घुन गया,
कॉपियाँ अनंत,कर तुरंत, बस रहा उतार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
अकबका गया ये,भकभका गया,गया जो कुछ,
म्यूज़ियम बना,हुआ न चार दिन नया जो कुछ,
बार-बार चीत्कार,और-और की पुकार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
ताक रख दिया है सच,झूठ बोलता है सच,
किरकिरे करे मेरे मज़े तो कुङकुङा है सच,
सत्य जामवंत,हनुमंत खोलता न द्वार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
ख़याल तितलियाँ रहे,तो लब्ध फूल सा रहे,
सुवास आस बन चले,प्रयास सूखता रहे,
शून्य से अनंत,बस भिङंत और धाङ-मार,कर न 'रुपक' ऐसा अत्याचार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
रुपक
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