Tuesday, May 17, 2011

लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है


लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
चिल्लाहट बेकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
रूखा-रूखा बासी-बासी,उतरी जैसे फोटो कॉपी,
अलसभोर का ख़्वाब बहुत बूढा बेदम है,
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
जब वो तुच्छ हुआ करता था,
कुछ ना कुच्छ हुआ करता था,
बदहवास सा क्षितिज़ पकङने,
नंगे पाँव भगा करता था
रूधिर बना तालाब गये शैवाल से जम हैं
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
सुप्त बुलबुले स्वप्न गगन में लुप्त हो गये
अमल आज के आज,त्वरित आश्वस्त हो गये;
हर दिन था जो खिन्न हाथ उसके परचम है
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
क्या अलब्ध है स्वर्ग?अलाभित श्रेयस्कर है?
या उपेक्षा मंत्र,समालोचन उत्तर है,
'रुपक' तथ्य ,प्रमेय,सूत्र ये सारे भ्रम हैं
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है 
चिल्लाहट बेकार गुरुत्वाकर्षण कम है
रुपक

Friday, January 28, 2011

क्या भारत रत्न सचिन के योग्य है?


हाल ही में बुद्धू बक्से के अधोभाग मे चमचमाने वाली खबरों में से एक पर सहसा द्रष्टि ठहर गयी। 'मास्टर ब्लास्टर सचिन रमेश तेंदुलकर का नाम भारत रत्न के लिये प्रस्तावित',"सचिन" ये नाम सुनकर सबके  चेहरे पर एक अद्भुत सी प्रसन्नता की लहर दौङ जाती है। जाति,संप्रदाय,भाषा और विविध बंधनों में जकङा भारत का हर व्यक्ति मात्र इसी नाम पर सहमति रखता है,ये नाम मनुष्यवाद का पर्याय बन चुका है और अवश्य ही औपचारिक या अनौपचारिक रुप से भारत का अमूल्य रत्न है। नाम जिसे सुनते ही कलम बहकने लगती है और प्रष्ठ कम पङने लगते हैं,किंतु वापस ख़बर पर आते हुऐ विचार करते हैं "क्या भारत रत्न सचिन के योग्य है' या अंग्रेज़ी में अधिक सहज प्रश्न होगा 'Does Bharat Ratna Deserve Sachin?'
प्रश्न भ्रकुटि तानने वाला हो सकता है किंतु भारत रत्न का इतिहास निराश करता है,भारत का सर्वोच्च सम्मान जो दिया जाता है कला,विग्यान,साहित्य या उच्च कोटि के जनसेवा के कार्यों के लिये,इसे प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारत के अति विशिष्ट नागरिकों की श्रेणी में सातवें पायदान पर आता है,और बहुत विशिष्ट स्थान रखता है.
आज तक 41 व्यक्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है,जिसमें से दो गैर भारतीय 'ख़ान अब्दुल ग़फ्फा़र खा़न' और 'नेल्सन मंडेला' भी शामिल हैं,जानकारी से तो अंतरजाल पटा पङा है,भारत रत्न को भारत का नोबल समझने से पहले यह विदित रहे कि न तो इस सम्मान को देने का कोई कालक्रम न ही कार्यक्रम समझ आता है। न ही ऐसा है कि हर साल यह सम्मान दिया जाता हो और न ही सम्मान पाने वले सारे नाम मन में सहज ही सम्मान का भाव ला पाते हैं।
सत्रह राजनीति से संबंधित नाम प्रश्न उपस्थित करते हैं,क्या यह भी आत्म महिमा मंडन का कोई साधन है?
सम्मान दिये जाने में होने वाले लंबे अंतराल पूछते हैं 'क्या भारत में योग्य व्यक्तियों की कमी हो गई है?' कुछ वर्ष पूर्व अटल जी का नाम प्रस्तावित किये जाने के बाद खेला गया गंदा राजनीतिक खेल पुरस्कार की गरिमा में कुछ और दाग़ लगा जाता है,आनन फानन में प्रस्तावित किये जाने वाले नाम हास्यास्पद ही नहीं निराशाजनक थे।

बात को यहीं विराम लगाते हुए कुछ प्रश्न खुले छोङ रहा हूँ, चलो आज नहीं तो कभी न कभी तो सचिन भारत रत्न के औपचारिक धारक हो ही जायेंगे किंतु क्या तब तक ये सम्मान सचिन का सम्मान करने योग्य बचेगा? क्या तब तक हम अपने देश के इस सर्वोच्च सम्मान का सम्मान रख पायेंगे?

बङा आदमी 'मैं'-बङा आदमी 'मैं'-
मेरा राज देखो,मेरा ताज देखो,
झुकाओ ज़रा सर तो ऊँचा दिखूँगा,
न मुझको हिमाकत से तुम आज देखो,
ये साबित किया है,मुकुट ने भी मेरे,
अँधेरे में चमचम मेरा तेज है वो,
चकाचौंध पर कौंध कर न बरसना,
नज़ाकत से चुनने हैं अल्फाज़ देखो,
ओ यश के पुजारी ,ओ पौरुष के कायल
मुकुट के बिना भी क्या सरताज? देखो।
बङा आदमी 'मैं'-बङा आदमी 'मैं'-
मेरा राज देखो,मेरा ताज देखो,
रुपक
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