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एक दिन सब मर ही जायेंगे

पर्यावरण का पतन

कौटिल्य का क्रोध

खिचड़ी वाला मेला

तट की तिमिलाहट

आज के युवा

सतत अनवरत अन्वेषण से,अकस्मिक भी मिल जाता है

न भूतो, न भविष्यति, था ये ऐसा साल

उर में उस्ताद हों

धवल योद्धा

सबके कृष्ण कन्हैया

'हाँ' 'हम्म' 'अच्छा' 'ख़ामोशी'...

ऐसी भी क्या बात हो गयी

सब अपने-अपने गाँव चले

आज भी कल के जैसी माँ

अंत न हो इस दौङ का

लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है

महाविकट औंघाई

आरज़ू अनंत,मन घुमंत

मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल