Monday, April 7, 2008

'सितारे ज़मी पर...


उम्रः14 वर्ष
संपत्तिः30-40 लाख
आयः10-20 लाख या ज़्यादा
पेशाःस्टेज परफॉर्मर
किसी ज़माने में इक्का दुक्का ही ऐसे प्रोफाईल्स सुनने को मिलते थे, किंतु आज हर तीसरे महीने दो-तीन सितारे जन्म ले रहे हैं, रियालिटी शो का फॉर्मूला हिट हो चुका है,और हर मध्यम वर्गीय परिवार जो जल्द से जल्द अमीर बन जाने की चाह कहीं न कहीं अपने मस्तक में छुपाये बैठा था,उसने भी अपनी जटायें खोल दी हैं, आँसुओं की गंगा फूट पङी है और सभी इसमें हाथ धो रहे हैं,मध्यम वर्ग के पास दो बङी शक्तियाँ हैं संख्या (सबसे बङा दर्शक समूह) और परिवार और उसके साथ जुङी भावनायें प्रेम,उम्मीदें,सपने,द्वेष ज़रा सा ग्लैमर का तङका लगाया और तैयार हो गयी मनोरंजन की लज़ीज़ रेसिपी, एक ओर जहाँ ये सराहनीय है कि समाज का वो वर्ग प्रतिनिधित्व पा रहा है जो अब तक पर्दे के दूसरी ओर मूक दर्शक बना बैठा था, काऊच पोटेटो न रहकर स्टेज पर जाकर ठुमके लगा रहा है, छोटे छोटे बच्चे जो गली क्रिकेट और लुका छिपी खेलकर बङे हो रहे थे अचानक उनको एक लक्ष्य मिल गया है, कोई संगीत सीख रहा है कोई डांस,जनता के हाथ में वोट की शक्ति आ गयी है, SMS अभिव्यक्ति का नया माध्यम बन गये हैं, हर कोई दोनों हाथों से कमा रहा है , परिवारवाद की नींव पर बाज़ारवाद पनप रहा है, सब खुश हैं कोई गङबङ नहीं।
अब ज़रा दूसरे पहलू पर गौर किया जाये , जहाँ से बात शुरू हुई थी, 12-15 साल की उम्र में लाखों कमाते बच्चे, और चकचौंध के बीच बुत बने अभिभावक, जो शायद सारी उम्र में भी उन्हें इतनी दौलत न दे पाते जो एक अच्छी परवरिश के लिये काफी हो, परवरिश ?? लेकिन अब किसकी ? और कैसे? बाज़ारवाद सोने का एक पिंजरा है, बाहर से चमकदार दिखने वाला, हर किसी को आकर्षित करने वाला,लेकिन अंदर आना जितना आसान है बाहर निकलना उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल, ग्लैमर की इस अंधी दौङ का हिस्सा बन चुके ये अभिमन्यु अंदर आने का रास्ता तो बना चुके हैं, लेकिन यहाँ टिकने और जीतने का संघर्ष कितने जीत पायेंगे ये तो आने वाला समय ही बतायेगा, सायकल चलाने कि उम्र में कार के मालिक बन चुके ये छोटे उस्ताद, ये लिल चैंप्स अपने कंधो पर सफलता का बोझ उठा पायेंगे? हो न हो शॉर्ट कट में मिली ये सफलता कहीं न कहीं उसके उस स्वाद को ज़रूर फीका कर देगी जो असफलता कि भट्टी में पक कर परिपक्व होती है, खैर जो भी हो हर नयी परंपरा के कुछ अच्छे बुरे पहलू तो होते ही हैं, अब ये नन्हें करोङपतियों की नई पौध आगे जाकर कैसे समाज का निर्माण करेगी ये देखना बाकि है, हाँ एक बात ज़रूर ध्यान रखनी होगी, आमिर के 'तारे ज़मीन पर' और ये नये 'सितारे ज़मीन पर' साथ ही फलें फूलें और आने वाले कल की एक मज़बूत नींव रखें यही कामना है।
रूपक

1 comment:

अनिल रघुराज said...

बड़ा खतरनाक सिलसिला चल निकला है यह। लिटिल चैंप या छोटे उस्ताद बाज़ार के लिए प्रतीक बन गए हैं, प्रचार के साधन बन गए हैं, औजार बन गए हैं। इसका हश्र क्या होगा, नहीं कहा जा सकता। हां, इतना ज़रूर है कि यह आम लोगों के लिए लॉटरी जैसा ही आत्मघाती है।

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