Saturday, November 16, 2013

मरीचिका

आज बाहर डिनर का प्लान था, खाना आने में अभी वक्त था, केंडल लाईट और बैकग्राउंड में गिटार की धुन माहौल को रुमानी बना रहे थे, तभी अचानक से उसके पैर के पास हलचल महसूस हुई, नीचे देखा तो एक साल की एक प्यारी सी गुङिया जिसने अभी अभी ही चलना सीखा होगा वो चलते हुए उसके पास आ गई थी, तभी अचानक बच्ची की माँ आ गईं और उसे गोद में उठाकर वापस ले गईं, उसने सामने देखा और दोनों के चेहरे पे हल्की मुस्कान तैर गई।
वापसी में संक्षिप्त सी बात हुई "क्या हुआ डियर, आज उस बच्ची को देखकर क्या सोच रहे थे ?" उसने कहा "I think i am ready now!"
घर में ख़ुशी और चहल पहल का माहौल था, जैसा सोचा था एक प्यारी सी बिटिया हुई, साथ ही एक ज़िम्मेदारी का अनुभव भी होने लगा, वो जल्दी से ज़्यादा पैसे कमा लेना चाहता था ताकि सारी ख़ुशियाँ ख़रीद पाये, उसने लेट नाईट शिफ्ट जॉईन कर ली जिसमें पंद्रह हज़ार महीने के अतिरिक्त मिल रहे थे, दिन में दोपहर बारह बजे तक सोना और चार बजे तक बेबी सिटिंग, चार बजे बिटिया की माँ घर आ जाती थी, काम इतना बढ गया कि वीकेंड में भी घर पर पेंडिग काम ही निपटाने लग गया।
साल भर गुज़र गया, संडे की दोपहर थी, वो हर हफ्ते की तरह लैपटॉप मे सर गङाये पेंडिग काम निपटा रहा था, उसे पैरों के पास हलचल महसूस हुई, देखा तो बिटिया उसका लोवर पकङे ऊपर देखकर हँस रही थी, उसने ध्यान ही नहीं दिया कि बिटिया कब चलना सीख गयी, अचानक से दो साल पहले का वो डिनर वाला द्रश्य याद आ गया, ऐसे ही एक छोटी बच्ची ने उसे पकङा था, वो कुर्सी से उठा और बिटिया को गोद में उठा लिया, पता नहीं कब तक चूमता रहा, तभी अचानक से 'New e-mail' Alert आ गया, एक अद्रश्य सी ज़ंजीर उसे वापस खींचने लगी, उसने दो चार खिलौने निकाले और बिटिया को पकङा दिये, वो 'पापा' 'पापा' बोलकर पीछे आई लेकिन उसे एक ज़रूरी कॉल लेना था, दरवाज़ा बंद करना पङा।

Sunday, May 12, 2013

माँ का किचन


Rs. 268+VAT...उसने बेफिक्री से पाँच सौ का नोट काले फोल्डर में घुसा दिया, गाँधी जी एक आँख से वेटर की प्रतीक्षा करने लगे, फोल्डर वापस आया तो गाँधी जी के दो बंदर पर्स के अंदर चले गये, बुरा सुनने वाला बंदर दस के नोट की शकल में वापस वेटर के साथ चला गया, आज वो सुनने के मूड में नहीं था।
"मैदे की डबल रोटी में सफेद गोंद डालकर सब्ज़ियों के टुकङे चिपका देते हैं, शायद कोई इत्र भी डालते हैं" ऐसा ही बताया था उसने माँ को फोन पर, जब पहली बार पिज़्ज़ा खाया था, दोस्त की ट्रीट थी, उसके बाद उसे लत लग गयी,शुरु शरु में वो लार बहाता आया करता था, और कभी कभी आँसू बहाते, आखिरी के कुछ ट्रिप में वो सुन्न सा आने लगा, उसे पता नहीं होता कि क्यूँ आया, बेफक्री से मेन्यू के किसी भी नाम पर ऊँगली रख देता, और आर्डर लेट होने की चाहत में चारों ओर आँखे घुमाता, यहाँ उसे बेहतर लगता था, ड्रिंक करने वालों की मधूशला था ये 'पिज़्ज़ा शॉप' ; पाप करने जैसी फीलिंग तो आती लेकिन खाने की तलब भी थी। 'May I Serve You!' लाल कपङे में स्मार्ट सा दिखने वाला लौंडा यही बोलकर दो टुकङे परोस देता।
" !बस माँ पेट फट जायेगा" "क्या हुआ रे तेरी भूख को, वज़न देख अपना, बाहर से खाकर आया क्या फिरसे आज?" घर में रोज़ भण्डारा खुल जाता था, मना करते करते भी दो चार रोटियाँ खाना ही पङता, तब तो खाना नहाने जैसा सामन्य काम था, कभी लगा नहीं कि रोटियाँ भी तीस रुपये की एक मिल सकती हैं, जेब पे इतनी भारी पङेंगी कि हलक से भी खिसकेंगी नहीं।
सफर के रोज़ मिठाई के डब्बे में माँ बीस पूरियाँ और अचार बाँध देती, हमेशा मुश्किल होता ये तय करना कि लेदर वाली जैकेट रख लूँ या खाने का डब्बा, माँ का दिल रखने को वो जैकेट पहनकर जाता, मई में भी! वैसे कमर पे जैकेट बाँधो तो माचो वाली फीलिंग आती थी।
पूरी अचार वाले एक्ज़ाम के टूर का़मयाब हुए और नौकरी लग गई, घर से दूर, बहुत दूर,इतनी दूर की बीस पूरियाँ कम थी और चालीस बास मारने लगतीं, और फिर उसने माँ का किचन छोङ दिया।
चिली फ्लेक्स, पेपर, सॉस इतना सब डालने के बाद भी सफेद गोंद वाली डबल रोटी हलक से नहीं उतर रही थी, उसने कोला गटका और मैदे का टुकङा पेट में ढकेल दिया, वैसे ही जैसे हर आने वाले दिन को अपनी ज़िंदग़ी की कि़ताब में ठूँसे जा रहा था,पन्ने पलटकर पढने की उसे फुरसत थी , हसरत।
उसकी भाभी के आने के बाद भैया माँ से कभी खुलकर प्यार जता सके, भाभी अच्छी हैं लेकिन वो भी अपनी माँ को मिस करती हैं, भैया मां के साथ रहते हैं, पर शायद दूरी बहुत ज़्यादा हो गई है..
आज तीन लङकियों की तस्वीर पापा ने -मेल की है, उसे भी किसी लङकी को उसकी माँ से दूर करना होगा, और शायद ख़ुद की भी, रिश्ते भी सुविधा की सफेद गोंद से ज़िंदग़ी की डबल रोटी में चिपके हैं, निर्णय का कोला ज़िंदगी को उ्म्र की हलक में ढकेले दे रहा है, जाते वक़्त उसने कोने में लगा घण्टा ज़ोर से बजाया, इतना ज़ोर से कि अंदर की आवाज़ बहरी हो गई।
'रुपक'

Tuesday, January 1, 2013

दिखा दो ज़ोर


अकङ से फूलती नसें हैं, जिस्म पत्थर है, 
दिखा दो ज़ोर, कि तुमसे न जीत पाए कोई।
सिकुङ के फूल सी बैठी है जिसके मन डर है, 
दिखा दो ज़ोर कि, तुमसे न जीत जाए कहीं। 

 दिखा दो ज़ोर, क्या माँ का पिया है दूध नहीं, 
दिखा दो ज़ोर कि, राखी में क़सम खायी थी, 
दिखा दो ज़ोर कि, जब पोतङे में ही थे तुम, 
तुम्हारी गंदगीं औरत ने ही उठाई थी। 

 दिखा दो ज़ोर कि, पौरुष न हार जाये कहीं, 
दिखा दो ज़ोर कि, घर का पका ही खाते हो, 
दिखा दो ज़ोर कि, दफ्तर से थक के आये हो, 
दिखा दो ज़ोर, क्या बीवी से खौ़फ़ खाते हो। 

 दिखा दो ज़ोर कि, तालीम ले के आये हो, 
सबक किताब के, मैडम ने ही सिखाये थे, 
दिखा दो ज़ोर कि, दादी ने ही बचाया था, 
गणित के टेस्ट में, जब शून्य ले के आये थे। 

 दिखा के ज़ोर तुम औरंगज़ेब बन जाओ; जहान औरतों बगै़र भी चल जायेगा। 

 रुपक

Friday, November 9, 2012

अंत न हो इस दौङ का


दीपक जलकर बुझ गये, बुझी न मन की आग;
सात पहर की वासना, एक पहर बैराग।

चकाचौंध की कौंध में , नयन-निलय आकाश;
फिरसे क्षितिज निहारते, बिसर गये क्या पास।

ख़ुशियाँ जैसे फुलझङी, संकट जैसे बम;
जितना भी बचते रहो, अभी फटेगा 'धम्म'

कोना कोना झाङकर आज बुहारा घूर;
फिर भी कुछ तो सङ रहा, बदबू है भरपूर।

जैसे तम निश्चिंत है , अनल ज्योति के पास;
वैसी भ्रष्टाचार की मची हुई बकवास।

उत्सव सुरा समान है, जब तक मिले न 'स्वर्ग'
कब आया कब चल दिया, उभर गये उत्सर्ग।

'रुपक' भी मदमस्त है, चल भागें उस ओर;
अंत न हो इस दौङ का, कभी मिले न छोर।

रुपेश पाण्डेय 'रूपक'

Thursday, November 8, 2012

विद्या ददाति विनयं ?

संस्कृत भाषा का एक प्रसिद्ध श्लोक है

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥

जिसका तात्पर्य यह है कि विद्यार्जन से मनुष्य विनयशील अथवा शिष्ट बनता है, ये विनम्रता ही उसे योग्य बनाती है, योग्यता से धन और इस प्रकार से कमाये गये धन से सुख की प्राप्ति होती है।
किंतु आज के परिवेष में यह सारा क्रम छिन्न-भिन्न दिखायी पङ रहा है। अभी हाल ही में सत्तासीन दल के वरिष्ठ विधि मंत्री विदेश के प्रतिष्ठित महाविद्यालय से अर्जित की गयी विद्या का दंभ भरते कदापि विनम्र दिखायी नहीं दे रहे थे; अपितु धमकी भरे स्वर में बोलते दीख पङ रहे थे। विपक्षी दल के एक अतिवरिष्ठ और वयोव्रद्ध वकील भी अपनी विद्या का दंभ भरते और अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करते देखे गये।
इक्का दुक्का नहीं सैकङों ऐसे उदाहरण समक्ष हैं, जहाँ विद्या विनय का कारक न होकर धनार्जन का स्त्रोत बनती जा रही है, जो जितना शिक्षित है वह उतने ही बुद्धिमत्ता पूर्ण उपायों से धन कमाना चाह रहा है, दूसरी और प्रश्न यह भी है कि शिक्षा किसे माना जाये ? क्योंकि कई ऐसे अल्पमति उपाधि विभूषित विद्याभूषण , आस पास देखे जा सकते हैं जिनकी तर्क शक्ति किसी कम पढे लिखे किसान से भी बहुत नीचे होती है; हालांकि यह एक अलग विषय है, आज वार्ता को यहीं विराम देकर एक प्रश्न विचार के लिये छोङ देते हैं किः
 
गर्व से तना ललाट , या तना घमण्ड से
नेत्र हैं प्रदीप्त या कि जल रहे प्रचण्ड से,
जो नसों में फूलता वो ग्यान है कि उग्रता,
क्या उपाधियाँ लिये भी लग रहे उद्दण्ड से?
 
रुपेश पाण्डेय 'रुपक'

Tuesday, May 17, 2011

लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है


लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
चिल्लाहट बेकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
रूखा-रूखा बासी-बासी,उतरी जैसे फोटो कॉपी,
अलसभोर का ख़्वाब बहुत बूढा बेदम है,
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
जब वो तुच्छ हुआ करता था,
कुछ ना कुच्छ हुआ करता था,
बदहवास सा क्षितिज़ पकङने,
नंगे पाँव भगा करता था
रूधिर बना तालाब गये शैवाल से जम हैं
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
सुप्त बुलबुले स्वप्न गगन में लुप्त हो गये
अमल आज के आज,त्वरित आश्वस्त हो गये;
हर दिन था जो खिन्न हाथ उसके परचम है
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है,
क्या अलब्ध है स्वर्ग?अलाभित श्रेयस्कर है?
या उपेक्षा मंत्र,समालोचन उत्तर है,
'रुपक' तथ्य ,प्रमेय,सूत्र ये सारे भ्रम हैं
लौटी न ललकार गुरुत्वाकर्षण कम है 
चिल्लाहट बेकार गुरुत्वाकर्षण कम है
रुपक

Friday, January 28, 2011

क्या भारत रत्न सचिन के योग्य है?


हाल ही में बुद्धू बक्से के अधोभाग मे चमचमाने वाली खबरों में से एक पर सहसा द्रष्टि ठहर गयी। 'मास्टर ब्लास्टर सचिन रमेश तेंदुलकर का नाम भारत रत्न के लिये प्रस्तावित',"सचिन" ये नाम सुनकर सबके  चेहरे पर एक अद्भुत सी प्रसन्नता की लहर दौङ जाती है। जाति,संप्रदाय,भाषा और विविध बंधनों में जकङा भारत का हर व्यक्ति मात्र इसी नाम पर सहमति रखता है,ये नाम मनुष्यवाद का पर्याय बन चुका है और अवश्य ही औपचारिक या अनौपचारिक रुप से भारत का अमूल्य रत्न है। नाम जिसे सुनते ही कलम बहकने लगती है और प्रष्ठ कम पङने लगते हैं,किंतु वापस ख़बर पर आते हुऐ विचार करते हैं "क्या भारत रत्न सचिन के योग्य है' या अंग्रेज़ी में अधिक सहज प्रश्न होगा 'Does Bharat Ratna Deserve Sachin?'
प्रश्न भ्रकुटि तानने वाला हो सकता है किंतु भारत रत्न का इतिहास निराश करता है,भारत का सर्वोच्च सम्मान जो दिया जाता है कला,विग्यान,साहित्य या उच्च कोटि के जनसेवा के कार्यों के लिये,इसे प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारत के अति विशिष्ट नागरिकों की श्रेणी में सातवें पायदान पर आता है,और बहुत विशिष्ट स्थान रखता है.
आज तक 41 व्यक्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है,जिसमें से दो गैर भारतीय 'ख़ान अब्दुल ग़फ्फा़र खा़न' और 'नेल्सन मंडेला' भी शामिल हैं,जानकारी से तो अंतरजाल पटा पङा है,भारत रत्न को भारत का नोबल समझने से पहले यह विदित रहे कि न तो इस सम्मान को देने का कोई कालक्रम न ही कार्यक्रम समझ आता है। न ही ऐसा है कि हर साल यह सम्मान दिया जाता हो और न ही सम्मान पाने वले सारे नाम मन में सहज ही सम्मान का भाव ला पाते हैं।
सत्रह राजनीति से संबंधित नाम प्रश्न उपस्थित करते हैं,क्या यह भी आत्म महिमा मंडन का कोई साधन है?
सम्मान दिये जाने में होने वाले लंबे अंतराल पूछते हैं 'क्या भारत में योग्य व्यक्तियों की कमी हो गई है?' कुछ वर्ष पूर्व अटल जी का नाम प्रस्तावित किये जाने के बाद खेला गया गंदा राजनीतिक खेल पुरस्कार की गरिमा में कुछ और दाग़ लगा जाता है,आनन फानन में प्रस्तावित किये जाने वाले नाम हास्यास्पद ही नहीं निराशाजनक थे।

बात को यहीं विराम लगाते हुए कुछ प्रश्न खुले छोङ रहा हूँ, चलो आज नहीं तो कभी न कभी तो सचिन भारत रत्न के औपचारिक धारक हो ही जायेंगे किंतु क्या तब तक ये सम्मान सचिन का सम्मान करने योग्य बचेगा? क्या तब तक हम अपने देश के इस सर्वोच्च सम्मान का सम्मान रख पायेंगे?

बङा आदमी 'मैं'-बङा आदमी 'मैं'-
मेरा राज देखो,मेरा ताज देखो,
झुकाओ ज़रा सर तो ऊँचा दिखूँगा,
न मुझको हिमाकत से तुम आज देखो,
ये साबित किया है,मुकुट ने भी मेरे,
अँधेरे में चमचम मेरा तेज है वो,
चकाचौंध पर कौंध कर न बरसना,
नज़ाकत से चुनने हैं अल्फाज़ देखो,
ओ यश के पुजारी ,ओ पौरुष के कायल
मुकुट के बिना भी क्या सरताज? देखो।
बङा आदमी 'मैं'-बङा आदमी 'मैं'-
मेरा राज देखो,मेरा ताज देखो,
रुपक
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