Sunday, April 27, 2008

'फर्स्ट इम्प्रेसन इज लास्ट इम्प्रेसन'


'फर्स्ट इम्प्रेसन इज लास्ट इम्प्रेसन' इसी जुमले को बार बार उछाल कर प्रचार किया गया था 'टशन' का,अब प्रतीत हो रहा है कि ये जुमला इन पर ही भारी पङ गया, जिस तरह से फिल्म के प्लाट को गुप्त रखा गया और रफ टफ छवि वाले प्रोमो दिखाये गये वो उत्सुकता जगाने के लिये काफी थे , किंतु यशराज बैनर का गणित फिर गङबङा गया, 'झूम बराबर झूम' की तरह 'टशन' भी बनी तो बङी आकर्षक, किंतु न तो कहानी थी न ही लय, संक्षेप में बोला जाए तो 'आत्माहीन सौंदर्य' या 'स्वादरहित माधुर्य' यदि मोहित कर सकते हैं तो मनोरंजन की द्रष्टि से कोई कमी नहीं है।
यशराज बैनर या अन्य बैनर की पिछली कुछ फिल्मों पर गौर किया जाए तो कहा जा सकता है कि उत्तर भारत के छोटे शहरों की जीवनशैली पर काफी अच्छा अध्ययन किया गया है, और काफी हद तक परदे पर सटीक चित्रण करने में सफल भी रहे हैं फिल्मकार,'लागा चुनरी में दाग' 'आजा नच ले' 'मनोरमा 6ft अंडर' 'ओंकारा' जैसे कुछ उदाहरण सामने हैं, फिर प्रकाश झा तो हमेशा से ही छोटे शहर की प्रष्ठ भूमि पर फिल्में बनाते आये हैं,बाज़ार का गणित, कहानी में नयापन,बढता दर्शक समूह कुछ कारक हैं इस परिवर्तन के।
वापस आते हैं 'टशन' पर,कहानी वैसे तो कुछ है नहीं और जो कुछ भी है,वो बताकर देखने वालों की उत्सुकता क्यों कम की जाये, बात करते हैं प्रदर्शन की, आज से 10-12 साल पहले जब सैफ और अक्षय की जोङी आयी थी 'मैं खिलाङी तू अनाङी' में तब के अनाङी सैफ इतने सालों बाद भी अभिनय में अनाङी ही नज़र आये, वैसे उनके कॉल सेंटर के कॉस्मोपॉलिटन चरित्र के लिये ज़यादा स्कोप भी नहीं था किंतु शून्य में भी संभावना कैसे ढूंढी जाती है ये सीखना है तो अक्षय से,साधारण से द्रश्य को अपने टच से कैसे असाधारण बनाया जाता है अक्षय इसकी मिसाल हैं, एक्शन किंग से कॉमेडी किंग तक का सफर बखूबी तय करने वाले इस कलाकार ने एक्शन और कॉमेडी तो निभायी ही डांस मे सैफ छोङो करीना तक को मात दे दी, 'व्हाईट व्हाईट फेस....' गाने में इनका ये पहलू भी खूब उभरकर आया, कुल मिलाकर अक्षय ने 100% दिया और बेशक 200% हासिल करेंगे, जहाँ तक करीना की बात करें तो फिल्म दर फिल्म उनके अभिनय में कमाल का आकर्षण आता जा रहा है, शारीरिक आकर्षण तो हमेशा से ही उनका मज़बूत पक्ष रहा है, यहाँ पर दोनों ही प्रतिभायें सामने आयीं,अनिल कपूर ने हास्य के क्षेत्र में हाथ आज़मानें शुरू किये और कुछ हद तक सफल भी रहे किंतु यहाँ मात खा गये,आधे संवाद तो समझ ही नहीं आते और जो आते हैं बेझिझक PJ की श्रेणी में रखे जा सकते, गाने काफी अच्छे बन पङे हैं और द्रश्यांकन बेहतरीन है।
कुल मिलाकर टुकङों टुकङों में फिल्म ठीक ठाक बन पङी है पिज़्ज़ा की तरह,पिज़्ज़ा जो डिलीवर हुआ 180 minutes में।
रूपक

Monday, April 7, 2008

'सितारे ज़मी पर...


उम्रः14 वर्ष
संपत्तिः30-40 लाख
आयः10-20 लाख या ज़्यादा
पेशाःस्टेज परफॉर्मर
किसी ज़माने में इक्का दुक्का ही ऐसे प्रोफाईल्स सुनने को मिलते थे, किंतु आज हर तीसरे महीने दो-तीन सितारे जन्म ले रहे हैं, रियालिटी शो का फॉर्मूला हिट हो चुका है,और हर मध्यम वर्गीय परिवार जो जल्द से जल्द अमीर बन जाने की चाह कहीं न कहीं अपने मस्तक में छुपाये बैठा था,उसने भी अपनी जटायें खोल दी हैं, आँसुओं की गंगा फूट पङी है और सभी इसमें हाथ धो रहे हैं,मध्यम वर्ग के पास दो बङी शक्तियाँ हैं संख्या (सबसे बङा दर्शक समूह) और परिवार और उसके साथ जुङी भावनायें प्रेम,उम्मीदें,सपने,द्वेष ज़रा सा ग्लैमर का तङका लगाया और तैयार हो गयी मनोरंजन की लज़ीज़ रेसिपी, एक ओर जहाँ ये सराहनीय है कि समाज का वो वर्ग प्रतिनिधित्व पा रहा है जो अब तक पर्दे के दूसरी ओर मूक दर्शक बना बैठा था, काऊच पोटेटो न रहकर स्टेज पर जाकर ठुमके लगा रहा है, छोटे छोटे बच्चे जो गली क्रिकेट और लुका छिपी खेलकर बङे हो रहे थे अचानक उनको एक लक्ष्य मिल गया है, कोई संगीत सीख रहा है कोई डांस,जनता के हाथ में वोट की शक्ति आ गयी है, SMS अभिव्यक्ति का नया माध्यम बन गये हैं, हर कोई दोनों हाथों से कमा रहा है , परिवारवाद की नींव पर बाज़ारवाद पनप रहा है, सब खुश हैं कोई गङबङ नहीं।
अब ज़रा दूसरे पहलू पर गौर किया जाये , जहाँ से बात शुरू हुई थी, 12-15 साल की उम्र में लाखों कमाते बच्चे, और चकचौंध के बीच बुत बने अभिभावक, जो शायद सारी उम्र में भी उन्हें इतनी दौलत न दे पाते जो एक अच्छी परवरिश के लिये काफी हो, परवरिश ?? लेकिन अब किसकी ? और कैसे? बाज़ारवाद सोने का एक पिंजरा है, बाहर से चमकदार दिखने वाला, हर किसी को आकर्षित करने वाला,लेकिन अंदर आना जितना आसान है बाहर निकलना उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल, ग्लैमर की इस अंधी दौङ का हिस्सा बन चुके ये अभिमन्यु अंदर आने का रास्ता तो बना चुके हैं, लेकिन यहाँ टिकने और जीतने का संघर्ष कितने जीत पायेंगे ये तो आने वाला समय ही बतायेगा, सायकल चलाने कि उम्र में कार के मालिक बन चुके ये छोटे उस्ताद, ये लिल चैंप्स अपने कंधो पर सफलता का बोझ उठा पायेंगे? हो न हो शॉर्ट कट में मिली ये सफलता कहीं न कहीं उसके उस स्वाद को ज़रूर फीका कर देगी जो असफलता कि भट्टी में पक कर परिपक्व होती है, खैर जो भी हो हर नयी परंपरा के कुछ अच्छे बुरे पहलू तो होते ही हैं, अब ये नन्हें करोङपतियों की नई पौध आगे जाकर कैसे समाज का निर्माण करेगी ये देखना बाकि है, हाँ एक बात ज़रूर ध्यान रखनी होगी, आमिर के 'तारे ज़मीन पर' और ये नये 'सितारे ज़मीन पर' साथ ही फलें फूलें और आने वाले कल की एक मज़बूत नींव रखें यही कामना है।
रूपक
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