Sunday, August 17, 2008

ख़ुदा जाने ये क्यों हुआ...


"जो कल बीत गया उसके लिये कुछ किया नहीं जा सकता,

पर आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिये, आज को सँवारना होगा"*

*(भावनाओं पर ध्यान दें,लफ्फाज़ी पर नहीं)

राज महाराज के इसी जीवन दर्शन पर आधारित है बहुचर्चित फिल्म 'बचना ऐ हसीनों', और जीवन दर्शन का प्रेरणा स्त्रोत हैं, तीन नायिकाओं के साथ अलग अलग परिस्थिती और भावों से हुये प्रणय प्रसंग, अब ये कहना ज़्यादती होगी कि तर्क की कसौटी में क्या खरा उतरता है क्या नहीं, वास्तविक जीवन से क्या जुङा है क्या नहीं, क्योंकि कदाचित सिनेमा अधूरे सपनों को दिखाने का एक माध्यम भी है, इन सब मानदण्डों से देखा जाय तो मुफ्त में, स्विट्ज़रलैंड, सिडनी,इटली की सुंदर यात्रा करवाने के लिये चोपङा जी को बहुत धन्यवाद, और छायाकार और निर्देशक को शाबासी, हाँ इस विश्व भ्रमण के बीच तीन कहानियाँ भी हैं , कहीं लुभाती , कहीं हँसाती और कहीं पकाती हुई।

कहानी के बारे में बहुत कुछ कहा, सुना, लिखा जा चुका है, हम बात करते हैं , क्या क्या 'टेक होम' है? पहला तो...और दूसरा...और तीसरा...हम्मम...काफी ज़ोर डाला दिमागो-दिल पर कुछ भी याद नहीं आ रहा; अब आप कहेंगे कि ' भाई फिल्में होती हैं मनोरंजन के लिये, संदेश ही लेना है तो दूरदर्शन में 'व्रत्तचित्र' देख लो' ये बात भी सही है,तो हम कहाँ कहते हैं कि हमने समाज सुधार की उम्मीद रखी थी, टाईटल ही ऐसा है कि पॉज़िटिव सोचो तो रोमांस की उम्मीद जागती है, निगेटिव सोचो तो लगता है कि 'गुलशन ग्रोवर' या 'शक्ति कपूर' की हसीनों को खुल्ली चेतावनी है।

रोमांस में भी ढेर सा 'टेक होम' होता है, जैसे 'जब वी मेट' या 'जाने तू...' या चोपङा साब की ही ऐतिहासिक क्रति 'DDLJ' को ले लो। हम ठहरे पाई-पाई का हिसाब रखने वाले, तो लगता है कुछ रोमांटिक पल ही साथ ले आते, खाली वक्त मे जुगाली कर लेते,पर निकला भावनाओं का 'बुफे' वो भी आखिरी टेबल तक पहुँचते पहुँचते बेस्वाद हो लिया, स्वीट डिश के नाम पर रैपर मे लॉली पॉप पकङा दिया (दीपिका की कहानी को ऐसा ज़ल्दी में लपेटा कि जैसे बोल रहे हों , चलो शो टाईम ओवर, बाकि रास्ते में सोच लेना)।

अब 'बुफे' कि उपमा दे ही दी है तो चलिये ऐसे ही बयान कर देते हैं, सजावट तो सुभान अल्लाह मनमोहक थी(बेहतरीन द्रश्यांकन),मेज़बानों ने बङी ग़र्मजोशी से स्वागत किया ( सारे कलाकारों का अभिनय प्रशंसनीय है, खासकर रणबीर और बिपाशा, हितेन पेण्टल इस फिल्म की बेहतरीन खोज है और किस्मत बुलंद रही तो बेशक स्थापित होंगे), बेहतरीन ख़ानसामे बुलाये गये(जाने माने निर्देशक 'सलाम-नमस्ते' और 'तारारमपम' फेम सिद्धार्थ) खानदान तो है ही नामी ग़िरामी ( चोपङा बैनर) , लेकिन फिर भी स्वाद फीका ही रह गया।कुल मिलाकर फिर अपना वही पुराना जुमला दोहराने का दिल करता है 'आत्माहीन सौंदर्य,और स्वाद रहित माधुर्य' है, यदि हाल ही के सालों में 'जब वी मेट' 'तारे ज़मीं पर' 'जाने तू...' न आयीं होती तो हम मानना शुरु कर चुके थे कि समय के साथ हमारे 'इमोशन्स' ही 'ड्रेन आऊट' हो चुके हैं,कितनी भी हाई डोज़ दो फर्क नहीं पङेगा, लेकिन उदाहरण सामने हैं, जो मानसिक संबल देते है, कि वैचारिक सरलता और अभिव्यक्ति की सहजता अभी भी संबध बना लेती है, दर्शकों से :

हमें आँसुओं की उम्मीद है,

न अगर खुशी के,तो ग़म के ही,

कहीं सूख के न फट पङे,

दिल में पङ गयी जो दरार सी।

'रूपक'

Friday, August 15, 2008

आओ सेण्टियाप मचाएं...






हम आज फिर भावुक हो लिये, भावुक अर्थात 'इमोशनल' जिसका तद्भव चल रहा है 'सेण्टी मारना' 'सेण्टी होना' और न जाने क्या क्या क्रियाएं लगाकर 'सेण्टी' शब्द की फजीहत की जा रही है, पहले तो ये था कि सेण्टित्व का भी एक वातावरण होता था, नदी का शांत किनारा, कमरे का अँधेरा कोना, ट्रेन का लम्बा सफर, यानि पूरा मूड बनाकर 'सेण्टी' हुआ जाता था, लेकिन आज न वो मौके रहे न वो दस्तूर हाँ 'सेण्टी होना' बदस्तूर जारी है, वर्क स्पेस में 'सेण्टी' होना 'इण्टेलिजेन्सी' हो गया है,बात बात पर 'सेण्टी मारना' कूल होने की निशानी बन गया है, ज़रा पूछ परख हुई तो आवेग में दूसरे पूछते फिरेंगे ' आज कल तो मस्त सेण्टियाप मचा रखा है!' ; खैर अब सफर में,नदी किनारे,या अँधियारे न कुछ 'सेण्टी' होता है न 'मेण्टल' बशर्ते कुछ डिपार्टमेण्टल होता दिख जाये तो आप 'सेण्टी' मत हो जाना।


चलो 'सेण्टी' की 'आईडेण्टिटी' तो बता ही दी , अब ये भी बता दें कि हम 'सेण्टी' क्यों हो गये; कुछ मौके ऐसे होते हैं कि हम पुनरावलोकन करने लगते हैं, 'मैं क्या ?हूँ' 'मैं क्यों हूँ?' 'मैं कौन हूँ?' प्रश्नवचन के इतने प्रहार कि 'क' शब्द से 'करण' 'एकता' या 'रोशन' को भी कब्ज़ियत हो जाये; शुरुआत होती है शुरु से , यानि कि 'नया साल' साल दर साल सवाल दर सवाल, 'क्या किया?' 'कहाँ थे?कहाँ आ पहुँचे?''क्या करें?''कब तक?' 'कैसे?' और न जाने 'क्या क्या....' फिर समय का पहिया घूमता है, आता है जन्म दिवस और सवालों की झङी इस बार मानकों के साथ 'इतने साल के हो गये़!!क्या किया??' 'कितना वक्त बचा अब?' 'फलाँ ने तो अब तक ये कर डाला था' और हम...???';लानतों और उलाहनाओं के सिलसिले...केक पर रखी क्रीम पिघलती है, मोमबत्ती की लौ धुआँ बनकर हवा हो जाती है,समय का पहिया घूमता है,इस बीच हर लंबे सफर में तात्क्षणिक कसमसाहट काबिज़ हो ही जाती है 'करने,'न कर पाने' और 'कर दिखाने' की 'करकराहट' कचोटती है। और भी मौके हैं , 'किसी की मैयत से लौटने पर मन में उपजा वैराग्य' 'जोङ जोङ कर जमा किया अचानक लुट जाय या खर्च करना पङ जाय तो 'खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जायेंगे गुनगुनाना' या लाखों में एक-आद को 'बुद्ध''महावीर' अशोका' की तरह 'सत्य का ग्यान' भी हो जाता है कभी कभी , अब ये ग्यान 'SPIRIT' से उपजा या 'SPRITE' से ये तो समय की कसौटी पर कसना पङता है, इन सब 'करकराहटों' के बीच कुछ प्रश्न 'स्व' की सीमा पार कर जाते हैं, वो 'जन''जाति' 'समाज' राष्ट्र''विश्व' के हो जाते हैं, कारक कुछ भी हो सकता है, हाल ही में 'लेजेण्ड ऑफ भगत सिंह' या 'स्वदेस' देख ली हो,या कोई देशभक्ति का आर्टिकल 'देख' 'पढ' 'सुन' लिया हो, या फिर कोई राष्ट्रीय त्यौहार हो जैसे कि '१५ अगस्त'...सवाल वही बस कटघरा बङा हो जाता है, सब जिरह करते हैं पर आरोपी कोई नहीं होता, कटघरे में होते हैं 'नेता' 'सरकार' 'इतिहास बनाने वाले'...न न अगर आप सोच रहे हैं कि अब मैं क्रांतिवीर होने वाला हूँ तो रुकिये, वो सब नहीं बोलूँगा, तो भाई सवाल होते हैं 'देश''समाज''सरकार' पर, पर घूमकर आ जाते हैं खुद पर, और फिर वही 'करकराहट' और 'कसमसाहट' 'काश....मैं ये होता''काश...ये करता' 'काश की लाश पर हताश अरमानों के फूल चढायें जाते हैं,काश के पाश में बँधे 'निराश' से बस 'सेण्टी' हो जाते हैं, चलिये एक काश की ताश हम भी खेलकर देखते हैं:


काश...ऊँगली,अँगूठा होती?


"रास्ता दिखाने वाले,लोगों को अँगूठा दिखाते नज़र आते, ऊँगली उठाने वाले अँगूठा उठा उठा कर 'बेस्ट ऑफ लक' कहने लगते, मतलब 'अच्छे' 'बुरे' और 'बुरे' 'अच्छे' काम करने लगते'...ये तो रहा मेरी काश की ताश का पहला पत्ता,


अब आप की कोई हसरत हताश करती हो,


हर मोङ पर काश काश...करती हो,


तो बयान कर ही डालिये,'आओ मिलकर सेण्टियाप मचाते हैं...


'रुपक'

Monday, August 4, 2008

मित्र


रचने वाले ने रच डाली,दुनिया बङी विचित्र,
रिश्ते नाते पल दो पल के जीवन भर के मित्र।
कष्ट समेटे रहना मुश्किल,मन की बातें कहना मुश्किल,
छिन में हो मन में हल्कापन,रहें मित्र जो गम में शामिल,
रहे साफगोई बन जाते कलुषित वचन पवित्र।
रिश्ते नाते पल दो पल के जीवन भर के मित्र।
कभी खींचते टाँग,कभी दुखती रग हाथ लगाते,
वही हँसाकर बेदम करते,बेदम वही रूलाते,
कभी ठिठोली बात बात पर, बिना बात के ठट्ठे,
कभी इकट्ठे बेसुध होना,फँसना कभी इकट्ठे;
बिगुल फूँक फिर कभी बचाना चेहरा,चाल,चरित्र;
रिश्ते नाते पल दो पल के जीवन भर के मित्र।
जिन हाथों में कहीं लकीरें नहीं दोस्ती वाली,
वही हाथ ताली दे गाते,कसमों की कव्वाली,
हर डाली में फूल याद के,पत्तों बिन हरियाली,
'यही' बनाया,'यहीं' बनाया, जब जी करो जुगाली;
भीना भीना इत्र समेटे, स्मृतियों के चित्र।
रचने वाले ने रच डाली,दुनिया बङी विचित्र,
रिश्ते नाते पल दो पल के जीवन भर के मित्र।
'रुपक'
Feedback Form
Feedback Analytics