Saturday, November 29, 2008

10 Things To Do Before We Die...'क्या?!!' 'कुछ नहीं।'.....


59घण्टे,Final-Assault,'Operation-Tornedo',NSG,Deccan-Mujahiddin,Taj,Tridant, Nariman,आतंकवादी/वाद,हमला,लापरवाही,...सुर्खियाँ,सुर्खियाँ,सुर्खियाँ,...

लांछन,आक्रोश,बैचेनी,क्रोध,विजय,गर्व,...भावनाएं,भावनाएं,भावनाएं,...

ये तीन दिन एक समारोह से हो गये, कोई सरकार की लाचारी पर रोया, कोई खुद की, कहीं भावनाएं उद्वेलित हुईं, कहीं प्रस्फुटित , कहीं वयस्क , कहीं उद्दण्ड। भद्र ,अभद्र बन गये, अभद्र , हिंसक और हिंसक , फिदायीन।विजय की घोषणा के साथ फिर वही मायूसी, "क्या??" "कुछ नहीं"

गौर किया तो पाया हम तो दर्शक दीर्घा में ही थे, वहीं रह गये,भारत इंग्लैंण्ड को पाँचवी बार हरा चुका था, हमें जश्न की बदहज़मी हो चली थी,'हाज़मे की गोलियाँ' खाने का वक्त था कि 'हादसे की गोलियाँ' दिखाई देने लगीं , फेविकॉल लगाकर चिपक गये 'बुद्धु बक्से' के सामने, चाय की तलब हुई, कुछ खाने को निकाल लिया, चेहरा पके पपीते सा हो गया , अब टपका कि तब टपका,खा पीकर सो गये, उठे तो दिन नया-२ सा लगा, उत्सुकता,क्या हुआ? देखें ज़रा। चाय की चुस्कियाँ बदस्तूर जारी...

कभी कभी आश्चर्य होता है अपनी क्षमता पर, कहाँ से जुटा लाते हैं हम इतना ग्यान ?? जो कल तक समझा रहे थे कि 'रोहित शर्मा को कैसे खेलना चाहिये, और तेंदुलकर कहाँ गल्ती करता है', आज उन्होंने कैफेटेरिया को 'जंग का रणनीति हॉल' बना डाला, कोई पूरे होटेल को डायनामाईट लगाकर उङाने की सिफारिश करता रहा, कोई 'मुसैड्स' की शान में कसीदे पढने लगा, किसी का गुस्सा निकला संप्रदाय पर और किसी का राजनेताओं पर,

चाय के हर घूँट के साथ गुस्से का एक ग़ुबार निकल जाता, फैल जाता फिज़ाँ में , बना लेता बादल किसी दूसरे ग़ुबार के साथ, टकरा जाता किसी भावनाशून्य चेहरे से बरस जाता बनकर आँसू, बङा वाला डस्टबीन आज लंच के पहले ही भर गया चाय-कॉफी के डिस्पोज़्ड कप्स से , डस्टबीन भरने की प्रक्रिया में लगे बुद्धिजीवियों के परिश्रम से अनजान बेवकूफ Office Boy उठा ले गया भावनाओं की ये खेप,ताकि नये प्लान बनाये जा सकें , नयी नसीहतें, नया ग़ुबार, नये बादल ,और कुछ बूँद बेबस आँसू...

माना कि कहानी में नयापन था, लेकिन बर्दाश्त की भी हद होती है, हमने तो सोचा था कमाण्डोस हैं तो थोङा Adventure होगा, याद आ गई हालिया पर्दशित फिल्म 'हीरोज़' अपाहिज़ 'सन्नी देओल' अपनी मुठ्ठियों से ज़मीन के परखच्चे उङाता जाता है,एक भी वैसा एक्शन नहीं, सारे '*#@%' भी ख़त्म हो चले दिमाग की नसें ऐंठ चुकी थीं, उत्तेजना में बेशक़ 'हाई' हुये हम , सॉलिड 'किक' लगा़! पर अब मज़ा नहीं आ रहा था, बाकि चैनल्स अब तक हङताल पर थे, थक हार कर वही आसरा, कोई मूवी, 'दसविदानिया' पिछले 'दस' दिनों से अपने दर्शक का इंतज़ार कर रही थी, 'आवारा राही ग़ुमशुदा...' चाहता था एक हाई 'किक' एक चुनौती, मानसिक उत्तेजना,और वो मिली, वाह!मज़ा आ गया!
कुछ चीज़ें अटल होती हैं, जैसे चाय की चुस्कियाँ, हमारा दर्शक दीर्घा में होना, नये नये तमाशे आयेंगे, ये चमत्कारों वाला देश है, ये हर विषय में महारती है, क्रिकेट से प्यार है, लेकिन "आरूषि हत्या काण्ड" की फिक्र भी, अपने किचन के साथ साथ 'बिग-बॉस' का भी किचन सँभालता है,इसने संसद में उछले नोटों के बण्डल भी देखे और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ,दिल्ली के एक्ज़िट पोल भी, 'बुद्धु बक्सा' सब दिखाता है,
"लेकिन कुछ चीज़ें अटल होती हैं, जैसे चाय की चुस्कियाँ, और हमारा दर्शक दीर्घा में होना, नये नये तमाशे आयेंगे, ये चमत्कारों वाला देश है, ये हर विषय में महारती है.....
अगली सुबह ख़ुमारी थी,' पता चला हम जंग जीत गये, मो.रफी,लता के 'वतन' वाले गाने बज रहे थे , माहौल में ताज़ापन था, चाय का स्वाद बढ गया,कुछ Pro Active Channels घटना की चीर-फाङ में लग गये, क्या, क्यों,कैसे,कब तक, ...प्रश्न,प्रश्न,प्रश्न????; '
सहसा 'दसविदानिया' याद हो आई, लगा देश की हालत 'कौल' ('विनय पाठक') जैसी हो गई है, दबंग दुनिया,बॉस की सी सवाल कर रही है "क्या!!!!"और जवाब है "कुछ नहीं"। क़ाश की कोई ऐसा डॉक्टर मिलता जो देश को बता पाता कि उसका 'कैंसर' 'लास्ट स्टेज' पर पहुँच चुका है, क़ाश कि हम भी सोच पाते "10 Things to Do Before We Die..."

ध्वजा थमा दो हाथ में शिखर का शंखनाद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
हो रक्त स्वेद भाल में न छल न भेद चाल में ,
कपाल में हो कँपकँपी रहे रुधिर ऊबाल में
निढाल जो पडा मिलूँ उछाल उन्माद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
यहाँ जायें
'रुपक'

Sunday, November 9, 2008

फैशन का है ये जलवा..


"बङे सपने छोटे शहरों में ज़्यादा बिकते हैं,क्योंकि वहाँ की बोरिंग ज़िंदगी को चटपटा बनाने के लिये ख़ूबसूरत सपनों का सहारा लेना ही पङता है..."

"जब सपने टूटते हैं तो उनकी गूँज का असर गहरा होता है.."


"सपने देखते हैं तब हमें कोई नहीं बताता कि उनके बदले हमें कितना कुछ खोना पङेगा.."

नहीं
नहींमैं पाँचवीं कक्षा का हिंदी का कोई प्रश्नपत्र हल नहीं कर रहा हूँ "सपने" शब्द का वाक्यों में प्रयोगवाला। ये तो सपनों की दुनिया की हकीकत बताने वाली बहुचर्चित फिल्म 'फैशन' के 'आदि' 'मध्य' और अंत' के वो संवाद हैं जो पूरी फिल्म का खाका बयान करते हैं, प्रबंधन के छात्रों को पूरा B.C.G. Matrix और Product Life Cycle समझाने वाली फिल्म है फैशन,छोटे शहर में रहकर बङे सपने देखने और उन्हें पूरा करने का माद्दा रखने वाली 'मेघना माथुर' की कहानी बङे शहर की भीङ में खो जाने वाली कहानी नहीं है,'मेघना' के सपने भरपूर उङान भरते हैं,लेकिन तभी तक जब तक वो अपनी पहचान कायम रख पाती है, पहचान आसमान में उङते हुए कदम ज़मीं पर रखने की, पहचान मॉडल बनने की चाहत रखने वाली हज़ारों लङकियों से अलग होने की,पहचान सफलता से अधिक अपने अस्तित्व,अपने नारीत्व,और आत्म-सम्मान को महत्ता देने की,

दुनिया
की नज़रों मे 'मेघना' अपनी सफलता का चरम तब हासिल करती है जब वो 'शोनाली' को उसके आसन से पदच्युत कर देती है, या मेघना के ही शब्दों में "ऐसा लग रहा था कि सारी दुनिया को मेरे अलावा कुछ दिखायी ही नहीं दे रहा था" , किंतु असल में उसका पतन तो तभी शुरू हो जाता है जब वो 'मानस' से आवेश में ये बोलकर घर छोङ देती है कि 'सफलता के बारे में हमेशा वही लोग भाषण क्यों देते हैं जिन्होंने सफलता कभी हासिल ही नहीं की' और 'मानस' के जवाब '...क्योंकि वो सफलता के पीछे पागल नहीं होते' को अनसुना कर देती है , बाहर की आवाज़ को अनसुना करते ही शुरु होती है उस सफलता की अंधी दौङ जिसके मानदंड और मापदंड भागने वाले को पता होते हैं, भगाने वाले को, मंज़िल और रास्ते दोनों ही मायने खो देते हैं,और सफर की परिणति होती है आत्मपलायन पर, 'मेघना' भागती है वहाँ तक जहाँ "उसे खुद की भी आवाज़ सुनायी दे" पतन के चरम बिंदु पर,भटकी हुई 'मेघना' और 'छोटे शहर की मेघना' का सामना होता है, और आत्मग्लानि संजीवनी का काम कर जाती है, 'अपने आप से अपना ही साथ छूट जाने' का बोझ ढो रही 'मेघना' को उसके पिता 'फिसलकर फिरसे उठने' की ताकत देते हैं,और शुरु होती है वो लङाई जहाँ सफलता किसी और के चश्मों,खाँचों,और परिभाषाओं की मोहताज नहीं रह जाती।

सपनों के सपने से बाहर आकर बात करें तो कहना होगा 'मधुर तुमने फिरसे कर दिखाया', मुख्य धारा के वास्तविक सिनेमा के पर्याय बन चुके मधुर अपने पुराने प्रयासों से कहीं भी उन्नीस नहीं पङे हैं,उच्च वर्ग की बनावटी,खोखली ज़िंदगी की परतें मधुर हमेशा ही खोलते रहे हैं,उच्च वर्ग की चमक-दमक के नीचे छुपी सङाँध दिखाते समय एक मध्यमवर्गीय की द्रष्टि साफ दिखाई देती है। समलैंगिक संबंध 'मधुर' का अतिप्रिय विषय लगता है, किसी किसी रुप में ये आता ही है, चाहे 'पेज-3','ट्रेफिक सिग्नल','कॉर्पोरेट' हो या फैशन', हास्य से शुरुआत करके 'गे-वाद' को अब तो संजीदा तौर पर पेश किया जाने लगा है,फैशन डिज़ायनर्स के चरित्र का ये पक्ष समझना एक अबूझ पहेली ही है। प्रियंका चोपङा ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया है,एक आशावादी लङकी से लेकर एक पतित निराशावादी युवती तक सारे चरित्रों को बखूबी सजीव किया है,कंगना बिगङैल,गुस्सैल, मनोरोगी के रोल इतने कर चुकी हैं कि लगता था सुधार की गुंजाईश ही नहीं, किंतु यहाँ उन्होने दिखा ही दिया कि ये चरित्र उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता, 'बाजवा' मे बहुत संभावना है, Summer-2007 के बाद ये एक और बेहतरीन कोशिश है, 'हर्ष छाया' की अटपटी संवाद अदायगी 'गे-चरित्र' को एक नया आयाम देती है, चित्रांशी('चक-दे फेम-कोमल चौटला) भी गिर पङ कर अभिनय सीख ही गयीं,कॉमेडी सर्कस(सोनी टी वी) की प्रैक्टिस काम गयी लगती है ;'मु्श्रान' मधुर की लॉबी के लॉयल अभिनेता बन चुके हैं और रोल-दर-रोल निखर रहे हैं, राज बब्बर पिता के रोल में खूब जमे हैं,मुग्धा गोडसे अपने रोल में बखूबी फब रही हैं, 'चक-दे' के बाद शायद ये एक और उल्लेखनीय नारी प्रधान फिल्म है, और 'फैशन' की दुनिया में भले ही 'Models are Treated Like Hangers!' किंतु यहाँ उनको अभिनय दिखाने का भरपूर मौका मिला है,कुल मिलाकर फिल्म इस साल की 'Show-Stopper' है, और 'बूम' जैसी 'फैशन-प्रधान' फिल्मों कि लिये एक सबक भी।

यहाँ
तालियों का बङा शोर है, यहाँ याद आती है माथे पे थप्पी;

यहाँ
पीठ ख़जर,गले मुस्कुराहट, यहाँ याद आती है,जादू की झप्पी;

अरसा
हुआ,खुल के एक लफ्ज़ बोले, यहाँ याद आती है,कक्षा की चुप्पी;

हज़ारों
नज़र नश्तरों सी चुभे हैं, नदारद मोहल्ले की वो लुका-छुप्पी।

'रुपक'

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