Monday, March 30, 2009

भभक उठा जो क्रोध


भभक उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

घमण्ड
है प्रचण्ड,मुण्ड दर्प सर्प कुण्डलित,
लोभ
,मोह,प्राप्ति से हो रहे नयन ललित,
शुचित
लगें सभी उपाय राय की ग़रज नहीं,
गरज
रही है 'एक-क्षत्र राज्य' की ही कल्पना।
भभक
उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त
रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

चक्षु
का अनल,स्वजन को देखकर,धधक रहा,
कथन
से 'नीति','सत्य','व्रत' के;अग्नि घ्रत,भङक रहा,
उचक
रही उद्दण्ता,पावसी-मण्डूक सी,
शौर्यहीन
कर रहा है "युद्ध-युद्ध" गर्जना।
भभक
उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त
रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

लो
प्रहार कर दिया, तार-तार कर दिया,
"मैं अजातशत्रु" सबको ख़बरदार कर दिया,
भर
दिया ज़हर,उमर के बरग़दी लगाव में,
घाव
में उतार आया पीढीयों की वेदना।
भभक
उठा जो क्रोध,भस्म हो गयी मति,सती हुई विमर्श की विरल विडंबना।
रक्त
रक्त हो गया,विधी विरक्त हो गया,प्रहार के, संहार के, श्रंगार में है संजना।

देखकर पयोधि,दंभ फूट-फूट रो पङा,
कुटैव
में भसम हुआ,किसी को फ़र्क क्यों पङा?
सकल
निशा वो ताकता रहा तरंगरोह को,
अस्थि
पुष्प बह गये, बहा पुष्प प्रेम का।
'रुपक' कटूक्ति त्याग,अब तालाशता प्रियंवदा।
रुपक

2 comments:

sleepingghost said...

As I always say got a lot to learn from you and am still learning. Finally I was able to relate myself with this poem. No words as am not the right person to comment for this one. Thanks for explaining this to me as this one was really difficult to comprehend. Carry on and yeah sooner or later I will pay the visit to "Payodhi".

Harjeet S. Rakhra said...

Well Well Well... Once I understood the gist(or more than that) of this poen I could easily relate the essence of this poem with some of my real-life experiences. True, just 2-minutes of wrath could trigger havoc in every sense of the word and that leaves nothng but destruction all over. I mean, its such a normal thought that every one of us would have experienced the destructive part of it atleast once in the life time, but still to put those woven thoughts into a hard-hitting "Kavita" is somethng commendable. U deserve a huge pat on the back. I feel proud to actually showcase ur creativity to my near-n-dear ones and I'm previeliged to do so :).
One more thing.. I am improving my hindi in notches in ur company ( I know the meaning of 'Chakshu" ..though, thanxx to my Hindi teacher)

Hey Rupesh... WHat abt "Sandarbh","Prasang" and "Bhawarth" of ur Kavitas for a poetry-ignorant but avid follower of Rupak like me?? Worth a shot???

Anyhow.... keep penning ... and yes.. U r better than many of those "Self proclaimed poets"... Apna bhi din aayegaa chote... :)

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