Thursday, November 8, 2012

विद्या ददाति विनयं ?

संस्कृत भाषा का एक प्रसिद्ध श्लोक है

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥

जिसका तात्पर्य यह है कि विद्यार्जन से मनुष्य विनयशील अथवा शिष्ट बनता है, ये विनम्रता ही उसे योग्य बनाती है, योग्यता से धन और इस प्रकार से कमाये गये धन से सुख की प्राप्ति होती है।
किंतु आज के परिवेष में यह सारा क्रम छिन्न-भिन्न दिखायी पङ रहा है। अभी हाल ही में सत्तासीन दल के वरिष्ठ विधि मंत्री विदेश के प्रतिष्ठित महाविद्यालय से अर्जित की गयी विद्या का दंभ भरते कदापि विनम्र दिखायी नहीं दे रहे थे; अपितु धमकी भरे स्वर में बोलते दीख पङ रहे थे। विपक्षी दल के एक अतिवरिष्ठ और वयोव्रद्ध वकील भी अपनी विद्या का दंभ भरते और अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करते देखे गये।
इक्का दुक्का नहीं सैकङों ऐसे उदाहरण समक्ष हैं, जहाँ विद्या विनय का कारक न होकर धनार्जन का स्त्रोत बनती जा रही है, जो जितना शिक्षित है वह उतने ही बुद्धिमत्ता पूर्ण उपायों से धन कमाना चाह रहा है, दूसरी और प्रश्न यह भी है कि शिक्षा किसे माना जाये ? क्योंकि कई ऐसे अल्पमति उपाधि विभूषित विद्याभूषण , आस पास देखे जा सकते हैं जिनकी तर्क शक्ति किसी कम पढे लिखे किसान से भी बहुत नीचे होती है; हालांकि यह एक अलग विषय है, आज वार्ता को यहीं विराम देकर एक प्रश्न विचार के लिये छोङ देते हैं किः
 
गर्व से तना ललाट , या तना घमण्ड से
नेत्र हैं प्रदीप्त या कि जल रहे प्रचण्ड से,
जो नसों में फूलता वो ग्यान है कि उग्रता,
क्या उपाधियाँ लिये भी लग रहे उद्दण्ड से?
 
रुपेश पाण्डेय 'रुपक'

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