Wednesday, December 31, 2008

सूरज नहीं डूबने दूँगा



एक वर्ष और बीत गया, हर वर्ष की भाँति समय की चौखट पर फिर क़दमों की रफ़्तार मंद हो चली है, थोङी बेचैनी, थोङी उदासी, कुछ झूठी सच्ची उम्मीदें, और गठरी भर अधूरे वादे और सपने,

...आग़ाज़!, शुरूआत!, शुभारंभ!,उदघाटन!, ये शब्द बङे रंगीन से हैं, रोशन और आशा से भरे, रोंगटे खङे करने वाले, सिहरन पैदा करने वाले,जज़्बा जगाने वाले, जज़्बात झंझोङने वाले,

...किस्मत, नियति, होनी, सांत्वना, दिलासा, पु(निर्माण)(प्रयास), ...ये शब्द बङे सादे हैं, भगवान पर छोङने वाले, बेफिक्र करने वाले, दर्शन जगाने वाले, भावुक बनाने वाले,

समय की चौखट पर भावनाओं का सागर उमङ पङा है, क़दम बहक रहे हैं, कभी अल्हङ,कभी यायावर, लौट लौट कर ढूँढ रहे हैं वो पदचिह्न जो अमिट छाप छोङ गये हों दहलीज़ के इस पार, अफ़सोस!यादों की मरीचिका बना देती है कुछ धुँधले से चित्र और फिर उठती है टीस की क्या लेकर जायें नये साल में,क्या किया इस साल में? बस अब और नहीं, रुकते हैं इस बार, बैठाते हैं पंचायत, सुलझाते हैं मसले ताकि फिर न टीस उठे, विद्रोही मन कह उठता है...तब तक...'सूरज नहीं डूबने दूँगा'...


मैनें फंदे बना लिए हैं पर्वत से उसको पकङूंगा ,

सूरज नहीं डूबने दूँगा ,सूरज नहीं डूबने दूँगा।

कई वर्ष से देख रहा हूँ सूरज तुझको आते जाते,

समरसता की नीरसता को नीरवता में पर फैलाते,

आते स्वर्णिम किरणें लेकर सिंदूरी सपने दे जाते,

'कहाँ लुटा आए सब सोना?' कान पकङकर ये पूछूँगा
सूरज नहीं डूबने दूँगा ,सूरज नहीं डूबने दूँगा।


साल ढले की साँझ ढले मेरे हाथ अधूरे सपने होंगें,

इतनी ज़ोर से मारूँगा कि तुम चंदा से जा चिपकोगे,

दोगे दग़ा दिवाकर द्रग को, निशी दिवस यूँ ही लटकोगे,

नक्षत्रों नाराज़ न होना नव रवि का आह्वान करूँगा।

सूरज नहीं डूबने दूँगा ,सूरज नहीं डूबने दूँगा।

सत्ता के उल्लू चमगादङ जनता से न चिपक सकेंगे ,

दुष्चरित्र दृष्टि बध्दों के सदन न दुति से दमक सकेंगे

ठेंगे से इनके क्रिसमस ये छः का छींका फोङ ही देंगे,

और दंगे भङक गये तो रक्तिम रातों में मैं सो न सकूँगा,

सूरज नहीं डूबने दूँगा ,सूरज नहीं डूबने दूँगा।

नव प्रभात नव वर्ष नव सदी नव आशा नवनीत बँटेंगे,

पिघल पिघल ये पृण टपकेंगे जब प्रचण्ड विस्फोट घटेंगे

हटेंगे फिर चेहरों से चेहरे प्रतिमानों के प्रष्ठ फटेंगे,

हर निषेध निशि में निषिद्ध है निश्चय है ये तम हर लूँगा,
सूरज नहीं डूबने दूँगा ,सूरज नहीं डूबने दूँगा।


बैठ गया था मौन क्षितिज पर पक्षी कलरव करते थे,

पर्वत लगा तापने गर्मी पशुदल पद रव करते थे,

हरते थे विश्वास मेरा उपहास उलाहित करते थे,

मैं रहूँ सफल न रहूँ किंतु फिर भी यह द्रुढ संकल्प धरूँगा,

सूरज नहीं डूबने दूँगा ,सूरज नहीं डूबने दूँगा।


"रुपक"

(रची गयी दिसंबर 31, सन्-1999 में, हिंद-युग्म में प्रकाशित एवं पुरस्क्रत हुई सन्-2008 में)

Saturday, November 29, 2008

10 Things To Do Before We Die...'क्या?!!' 'कुछ नहीं।'.....


59घण्टे,Final-Assault,'Operation-Tornedo',NSG,Deccan-Mujahiddin,Taj,Tridant, Nariman,आतंकवादी/वाद,हमला,लापरवाही,...सुर्खियाँ,सुर्खियाँ,सुर्खियाँ,...

लांछन,आक्रोश,बैचेनी,क्रोध,विजय,गर्व,...भावनाएं,भावनाएं,भावनाएं,...

ये तीन दिन एक समारोह से हो गये, कोई सरकार की लाचारी पर रोया, कोई खुद की, कहीं भावनाएं उद्वेलित हुईं, कहीं प्रस्फुटित , कहीं वयस्क , कहीं उद्दण्ड। भद्र ,अभद्र बन गये, अभद्र , हिंसक और हिंसक , फिदायीन।विजय की घोषणा के साथ फिर वही मायूसी, "क्या??" "कुछ नहीं"

गौर किया तो पाया हम तो दर्शक दीर्घा में ही थे, वहीं रह गये,भारत इंग्लैंण्ड को पाँचवी बार हरा चुका था, हमें जश्न की बदहज़मी हो चली थी,'हाज़मे की गोलियाँ' खाने का वक्त था कि 'हादसे की गोलियाँ' दिखाई देने लगीं , फेविकॉल लगाकर चिपक गये 'बुद्धु बक्से' के सामने, चाय की तलब हुई, कुछ खाने को निकाल लिया, चेहरा पके पपीते सा हो गया , अब टपका कि तब टपका,खा पीकर सो गये, उठे तो दिन नया-२ सा लगा, उत्सुकता,क्या हुआ? देखें ज़रा। चाय की चुस्कियाँ बदस्तूर जारी...

कभी कभी आश्चर्य होता है अपनी क्षमता पर, कहाँ से जुटा लाते हैं हम इतना ग्यान ?? जो कल तक समझा रहे थे कि 'रोहित शर्मा को कैसे खेलना चाहिये, और तेंदुलकर कहाँ गल्ती करता है', आज उन्होंने कैफेटेरिया को 'जंग का रणनीति हॉल' बना डाला, कोई पूरे होटेल को डायनामाईट लगाकर उङाने की सिफारिश करता रहा, कोई 'मुसैड्स' की शान में कसीदे पढने लगा, किसी का गुस्सा निकला संप्रदाय पर और किसी का राजनेताओं पर,

चाय के हर घूँट के साथ गुस्से का एक ग़ुबार निकल जाता, फैल जाता फिज़ाँ में , बना लेता बादल किसी दूसरे ग़ुबार के साथ, टकरा जाता किसी भावनाशून्य चेहरे से बरस जाता बनकर आँसू, बङा वाला डस्टबीन आज लंच के पहले ही भर गया चाय-कॉफी के डिस्पोज़्ड कप्स से , डस्टबीन भरने की प्रक्रिया में लगे बुद्धिजीवियों के परिश्रम से अनजान बेवकूफ Office Boy उठा ले गया भावनाओं की ये खेप,ताकि नये प्लान बनाये जा सकें , नयी नसीहतें, नया ग़ुबार, नये बादल ,और कुछ बूँद बेबस आँसू...

माना कि कहानी में नयापन था, लेकिन बर्दाश्त की भी हद होती है, हमने तो सोचा था कमाण्डोस हैं तो थोङा Adventure होगा, याद आ गई हालिया पर्दशित फिल्म 'हीरोज़' अपाहिज़ 'सन्नी देओल' अपनी मुठ्ठियों से ज़मीन के परखच्चे उङाता जाता है,एक भी वैसा एक्शन नहीं, सारे '*#@%' भी ख़त्म हो चले दिमाग की नसें ऐंठ चुकी थीं, उत्तेजना में बेशक़ 'हाई' हुये हम , सॉलिड 'किक' लगा़! पर अब मज़ा नहीं आ रहा था, बाकि चैनल्स अब तक हङताल पर थे, थक हार कर वही आसरा, कोई मूवी, 'दसविदानिया' पिछले 'दस' दिनों से अपने दर्शक का इंतज़ार कर रही थी, 'आवारा राही ग़ुमशुदा...' चाहता था एक हाई 'किक' एक चुनौती, मानसिक उत्तेजना,और वो मिली, वाह!मज़ा आ गया!
कुछ चीज़ें अटल होती हैं, जैसे चाय की चुस्कियाँ, हमारा दर्शक दीर्घा में होना, नये नये तमाशे आयेंगे, ये चमत्कारों वाला देश है, ये हर विषय में महारती है, क्रिकेट से प्यार है, लेकिन "आरूषि हत्या काण्ड" की फिक्र भी, अपने किचन के साथ साथ 'बिग-बॉस' का भी किचन सँभालता है,इसने संसद में उछले नोटों के बण्डल भी देखे और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ,दिल्ली के एक्ज़िट पोल भी, 'बुद्धु बक्सा' सब दिखाता है,
"लेकिन कुछ चीज़ें अटल होती हैं, जैसे चाय की चुस्कियाँ, और हमारा दर्शक दीर्घा में होना, नये नये तमाशे आयेंगे, ये चमत्कारों वाला देश है, ये हर विषय में महारती है.....
अगली सुबह ख़ुमारी थी,' पता चला हम जंग जीत गये, मो.रफी,लता के 'वतन' वाले गाने बज रहे थे , माहौल में ताज़ापन था, चाय का स्वाद बढ गया,कुछ Pro Active Channels घटना की चीर-फाङ में लग गये, क्या, क्यों,कैसे,कब तक, ...प्रश्न,प्रश्न,प्रश्न????; '
सहसा 'दसविदानिया' याद हो आई, लगा देश की हालत 'कौल' ('विनय पाठक') जैसी हो गई है, दबंग दुनिया,बॉस की सी सवाल कर रही है "क्या!!!!"और जवाब है "कुछ नहीं"। क़ाश की कोई ऐसा डॉक्टर मिलता जो देश को बता पाता कि उसका 'कैंसर' 'लास्ट स्टेज' पर पहुँच चुका है, क़ाश कि हम भी सोच पाते "10 Things to Do Before We Die..."

ध्वजा थमा दो हाथ में शिखर का शंखनाद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
हो रक्त स्वेद भाल में न छल न भेद चाल में ,
कपाल में हो कँपकँपी रहे रुधिर ऊबाल में
निढाल जो पडा मिलूँ उछाल उन्माद दो,
कहो न मुझको धीर तुम अधीर शब्द लाद दो।
यहाँ जायें
'रुपक'

Sunday, November 9, 2008

फैशन का है ये जलवा..


"बङे सपने छोटे शहरों में ज़्यादा बिकते हैं,क्योंकि वहाँ की बोरिंग ज़िंदगी को चटपटा बनाने के लिये ख़ूबसूरत सपनों का सहारा लेना ही पङता है..."

"जब सपने टूटते हैं तो उनकी गूँज का असर गहरा होता है.."


"सपने देखते हैं तब हमें कोई नहीं बताता कि उनके बदले हमें कितना कुछ खोना पङेगा.."

नहीं
नहींमैं पाँचवीं कक्षा का हिंदी का कोई प्रश्नपत्र हल नहीं कर रहा हूँ "सपने" शब्द का वाक्यों में प्रयोगवाला। ये तो सपनों की दुनिया की हकीकत बताने वाली बहुचर्चित फिल्म 'फैशन' के 'आदि' 'मध्य' और अंत' के वो संवाद हैं जो पूरी फिल्म का खाका बयान करते हैं, प्रबंधन के छात्रों को पूरा B.C.G. Matrix और Product Life Cycle समझाने वाली फिल्म है फैशन,छोटे शहर में रहकर बङे सपने देखने और उन्हें पूरा करने का माद्दा रखने वाली 'मेघना माथुर' की कहानी बङे शहर की भीङ में खो जाने वाली कहानी नहीं है,'मेघना' के सपने भरपूर उङान भरते हैं,लेकिन तभी तक जब तक वो अपनी पहचान कायम रख पाती है, पहचान आसमान में उङते हुए कदम ज़मीं पर रखने की, पहचान मॉडल बनने की चाहत रखने वाली हज़ारों लङकियों से अलग होने की,पहचान सफलता से अधिक अपने अस्तित्व,अपने नारीत्व,और आत्म-सम्मान को महत्ता देने की,

दुनिया
की नज़रों मे 'मेघना' अपनी सफलता का चरम तब हासिल करती है जब वो 'शोनाली' को उसके आसन से पदच्युत कर देती है, या मेघना के ही शब्दों में "ऐसा लग रहा था कि सारी दुनिया को मेरे अलावा कुछ दिखायी ही नहीं दे रहा था" , किंतु असल में उसका पतन तो तभी शुरू हो जाता है जब वो 'मानस' से आवेश में ये बोलकर घर छोङ देती है कि 'सफलता के बारे में हमेशा वही लोग भाषण क्यों देते हैं जिन्होंने सफलता कभी हासिल ही नहीं की' और 'मानस' के जवाब '...क्योंकि वो सफलता के पीछे पागल नहीं होते' को अनसुना कर देती है , बाहर की आवाज़ को अनसुना करते ही शुरु होती है उस सफलता की अंधी दौङ जिसके मानदंड और मापदंड भागने वाले को पता होते हैं, भगाने वाले को, मंज़िल और रास्ते दोनों ही मायने खो देते हैं,और सफर की परिणति होती है आत्मपलायन पर, 'मेघना' भागती है वहाँ तक जहाँ "उसे खुद की भी आवाज़ सुनायी दे" पतन के चरम बिंदु पर,भटकी हुई 'मेघना' और 'छोटे शहर की मेघना' का सामना होता है, और आत्मग्लानि संजीवनी का काम कर जाती है, 'अपने आप से अपना ही साथ छूट जाने' का बोझ ढो रही 'मेघना' को उसके पिता 'फिसलकर फिरसे उठने' की ताकत देते हैं,और शुरु होती है वो लङाई जहाँ सफलता किसी और के चश्मों,खाँचों,और परिभाषाओं की मोहताज नहीं रह जाती।

सपनों के सपने से बाहर आकर बात करें तो कहना होगा 'मधुर तुमने फिरसे कर दिखाया', मुख्य धारा के वास्तविक सिनेमा के पर्याय बन चुके मधुर अपने पुराने प्रयासों से कहीं भी उन्नीस नहीं पङे हैं,उच्च वर्ग की बनावटी,खोखली ज़िंदगी की परतें मधुर हमेशा ही खोलते रहे हैं,उच्च वर्ग की चमक-दमक के नीचे छुपी सङाँध दिखाते समय एक मध्यमवर्गीय की द्रष्टि साफ दिखाई देती है। समलैंगिक संबंध 'मधुर' का अतिप्रिय विषय लगता है, किसी किसी रुप में ये आता ही है, चाहे 'पेज-3','ट्रेफिक सिग्नल','कॉर्पोरेट' हो या फैशन', हास्य से शुरुआत करके 'गे-वाद' को अब तो संजीदा तौर पर पेश किया जाने लगा है,फैशन डिज़ायनर्स के चरित्र का ये पक्ष समझना एक अबूझ पहेली ही है। प्रियंका चोपङा ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया है,एक आशावादी लङकी से लेकर एक पतित निराशावादी युवती तक सारे चरित्रों को बखूबी सजीव किया है,कंगना बिगङैल,गुस्सैल, मनोरोगी के रोल इतने कर चुकी हैं कि लगता था सुधार की गुंजाईश ही नहीं, किंतु यहाँ उन्होने दिखा ही दिया कि ये चरित्र उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता, 'बाजवा' मे बहुत संभावना है, Summer-2007 के बाद ये एक और बेहतरीन कोशिश है, 'हर्ष छाया' की अटपटी संवाद अदायगी 'गे-चरित्र' को एक नया आयाम देती है, चित्रांशी('चक-दे फेम-कोमल चौटला) भी गिर पङ कर अभिनय सीख ही गयीं,कॉमेडी सर्कस(सोनी टी वी) की प्रैक्टिस काम गयी लगती है ;'मु्श्रान' मधुर की लॉबी के लॉयल अभिनेता बन चुके हैं और रोल-दर-रोल निखर रहे हैं, राज बब्बर पिता के रोल में खूब जमे हैं,मुग्धा गोडसे अपने रोल में बखूबी फब रही हैं, 'चक-दे' के बाद शायद ये एक और उल्लेखनीय नारी प्रधान फिल्म है, और 'फैशन' की दुनिया में भले ही 'Models are Treated Like Hangers!' किंतु यहाँ उनको अभिनय दिखाने का भरपूर मौका मिला है,कुल मिलाकर फिल्म इस साल की 'Show-Stopper' है, और 'बूम' जैसी 'फैशन-प्रधान' फिल्मों कि लिये एक सबक भी।

यहाँ
तालियों का बङा शोर है, यहाँ याद आती है माथे पे थप्पी;

यहाँ
पीठ ख़जर,गले मुस्कुराहट, यहाँ याद आती है,जादू की झप्पी;

अरसा
हुआ,खुल के एक लफ्ज़ बोले, यहाँ याद आती है,कक्षा की चुप्पी;

हज़ारों
नज़र नश्तरों सी चुभे हैं, नदारद मोहल्ले की वो लुका-छुप्पी।

'रुपक'

Wednesday, October 29, 2008

एक दीवाली ऐसी बीती


कानों में अनवरत पटाखे,
आँखें ताक रहीं थीं भीति,
एक दीवाली ऐसी बीती।

कुछ तो हो-कुछ तो हो,कहकर,
मन तो उछल रहा था बल्ली,
अरमानों को पंख लगे थे ,

कदमों की थी गति पुछल्ली।

अल्हङपन अधमरा रह गया,

अब के मायूसी ही जीती;

एक दीवाली ऐसी बीती।


कंधों के बाज़ार हो गयी,
जब से बेफिक्री की बिक्री,
तब से हम बस सत्य ढो रहे,

हम पर लागू नहीं सिरफिरी,

हर एक 'वर्क' का 'तर्क' करेंगे,

कहो,भला क्या गरज पङी थी?

एक दीवाली ऐसी बीती।


सरल,सहज,संवेदनशाली,
चेहरे चढे मुखौटों वाली,

मसले मसल-मसल करके,

नस्ल-ए-नासूर बनाने वाली,

अब के दीवाली की सूरत,

समाकलन में घुसी ज्यामिती,

एक दीवाली ऐसी बीती।


सुन-सुन कर अब सुन्न हो गये,
सारे साल पटाखे छूटे,

हाथ कान से हटें तभी तो,

हाथ-हाथ के अंकुर फूटें,

भयाक्रांत,संभ्रांत बन गये,

प्रतिक्रियाएं बनी कुरीति;

एक दीवाली ऐसी बीती।


एक चमक चमचम सी मीठी,

एक रोशनी-लङियों सी,

एक चमक है चमत्कार की,

चंचल गुड्डे गुङियों सी,

घङी ताकते भोर हुई,

और एक चमक 'रुपक' की थी,

एक दीवाली ऐसी बीती।


कानों में प्रतिध्वनि रात की,

आँखें फिरसे हुईं उनींदी ,

एक दीवाली ऐसी बीती।

'रुपक'

Tuesday, September 9, 2008

रॉक ऑन...ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा...

'जियो अपने सपनों को' ये है संदेश युवाओं में लोकप्रिय हो चुके फरहान और उनकी 'रॉक ऑन' टीम का,सबसे पहले तो टीम को बधाईयाँ विश्व में प्रतिष्ठत 'रोलिंग स्टोन्स' पत्रिका के मुखप्रष्ठ में आने के लिये, ए. आर. रहमान के बाद ये दूसरे भारतीय हैं जिन्हे यह गौरव प्राप्त हुआ है।

युवाओं की प्रेरणा बन चुके फरहान हमेशा ही कुछ नया और सफल लेकर आते हैं,और उसे लोकप्रिय बना देते हैं।
'रॉक ऑन' भी अपवाद नहीं है, जब शीर्षक ही इंगित करे कि कहानी है संगीत और उसके जुनून की तो बात शब्दों में न रहकर सुरों में बहने,बहकने लग जाती है, चाहे फिल्म की शुरुआत में टेम्पो बनाता, 'सोचा है......ये तुमने क्या कभी' गीत हो या एक यायावर युवा की छोटी किंतु महत्वपूर्ण बातों को बयान करता 'मेरी लॉण्ड्री का एक बिल...' तारीफ करनी होगी जावेद अख्तर जी कि जिन्होंने फिरसे अपनी विलक्षण लेखनी का लोहा मनवा दिया, और 'शंकर- एहसान-लॉय' की जो अब सफलता का पर्यायवाची बन चुके हैं।

जुनून और जज़्बातों से बाहर आकर बात करें तो वाकई समीक्षा करना ज़रा मुश्किल जान पङता है, 'रॉक ऑन' किनारे पर खङे होकर अवलोकन करने जैसा कुछ भी नहीं देती, ये आमंत्रित करती है अपनी लहरों के उच्चावचन में डूबने उतराने और खो जाने के लिये, जो कि यदि आप न करना चाहें तो ये आपको अँधेरे कमरों में कान फोङते कुछ पागलों के मिलन समारोह से अधिक कुछ भी नहीं लगेगा। जीवन के मशीनीकरण और आर्थिक विवशताओं के चलते समझौतों और भावनाओं के दमन की कहानियाँ आती रहीं हैं,और आने वाले समय में इनकी संख्या बढने ही वाली है, दीगर है कि सिनेमा समाज का आईना है,और समाज आर्थिक विवशताओं और मशीनीकरण के मायाजाल में बुरी तरह फँसता जा रहा है, कारण है कि भावनाओं को भी हम कैप्सूल की तरह डोज़ेज़ में लेना चाह रहें हैं, सब कुछ समय सारणी-बध्द और सतही होता जा रहा है, धैर्य की समय सीमा और सहन सीमा दोनों ही घट रहे हैं।

प्रदर्शन की बात करें तो हर ओर फरहान ही फरहान हैं, कमाल का अल्हङपन काबिल-ए-तारीफ संज़ीदगी, अर्जुन रामपाल ने पूरा न्याय किया 'जो' के किरदार के साथ, पूरब कोहली ने अपने खिलंदङ अंदाज़ में आकर्षित किया, तो 'केनी' ने एक 'रॉक स्टार' के लुक को अमली जामा पहनाया, 'सास बहू' सीरियल्स के चक्रवयूह को तोङती प्राची देसाई ने अपने सधे हुये अभिनय और नयनाभिराम सौंदर्य से आकर्षित किया है।कुल मिलाकर फिल्म स्थापित मान्यताओं को तोङती है, और सिनेमा में प्रयोग का साहस रखने वालों को एक संबल देती है।

ये कहते सुना था,कि बादल फटा था,
गया भागता भीङ के साथ मैं;

न मुखबिर मिला,न अँधेरा छँटा था
थी अफवाह अँधों की बारात में,

बहुत खो दिया,भेङ की दौङ में,
मगर राख ही राख थी हाथ में,

जो सपनों को जीता मुक़द्दर न खोता,
लकीरों से करता रहा बात मैं।
'रूपक'

Sunday, August 17, 2008

ख़ुदा जाने ये क्यों हुआ...


"जो कल बीत गया उसके लिये कुछ किया नहीं जा सकता,

पर आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिये, आज को सँवारना होगा"*

*(भावनाओं पर ध्यान दें,लफ्फाज़ी पर नहीं)

राज महाराज के इसी जीवन दर्शन पर आधारित है बहुचर्चित फिल्म 'बचना ऐ हसीनों', और जीवन दर्शन का प्रेरणा स्त्रोत हैं, तीन नायिकाओं के साथ अलग अलग परिस्थिती और भावों से हुये प्रणय प्रसंग, अब ये कहना ज़्यादती होगी कि तर्क की कसौटी में क्या खरा उतरता है क्या नहीं, वास्तविक जीवन से क्या जुङा है क्या नहीं, क्योंकि कदाचित सिनेमा अधूरे सपनों को दिखाने का एक माध्यम भी है, इन सब मानदण्डों से देखा जाय तो मुफ्त में, स्विट्ज़रलैंड, सिडनी,इटली की सुंदर यात्रा करवाने के लिये चोपङा जी को बहुत धन्यवाद, और छायाकार और निर्देशक को शाबासी, हाँ इस विश्व भ्रमण के बीच तीन कहानियाँ भी हैं , कहीं लुभाती , कहीं हँसाती और कहीं पकाती हुई।

कहानी के बारे में बहुत कुछ कहा, सुना, लिखा जा चुका है, हम बात करते हैं , क्या क्या 'टेक होम' है? पहला तो...और दूसरा...और तीसरा...हम्मम...काफी ज़ोर डाला दिमागो-दिल पर कुछ भी याद नहीं आ रहा; अब आप कहेंगे कि ' भाई फिल्में होती हैं मनोरंजन के लिये, संदेश ही लेना है तो दूरदर्शन में 'व्रत्तचित्र' देख लो' ये बात भी सही है,तो हम कहाँ कहते हैं कि हमने समाज सुधार की उम्मीद रखी थी, टाईटल ही ऐसा है कि पॉज़िटिव सोचो तो रोमांस की उम्मीद जागती है, निगेटिव सोचो तो लगता है कि 'गुलशन ग्रोवर' या 'शक्ति कपूर' की हसीनों को खुल्ली चेतावनी है।

रोमांस में भी ढेर सा 'टेक होम' होता है, जैसे 'जब वी मेट' या 'जाने तू...' या चोपङा साब की ही ऐतिहासिक क्रति 'DDLJ' को ले लो। हम ठहरे पाई-पाई का हिसाब रखने वाले, तो लगता है कुछ रोमांटिक पल ही साथ ले आते, खाली वक्त मे जुगाली कर लेते,पर निकला भावनाओं का 'बुफे' वो भी आखिरी टेबल तक पहुँचते पहुँचते बेस्वाद हो लिया, स्वीट डिश के नाम पर रैपर मे लॉली पॉप पकङा दिया (दीपिका की कहानी को ऐसा ज़ल्दी में लपेटा कि जैसे बोल रहे हों , चलो शो टाईम ओवर, बाकि रास्ते में सोच लेना)।

अब 'बुफे' कि उपमा दे ही दी है तो चलिये ऐसे ही बयान कर देते हैं, सजावट तो सुभान अल्लाह मनमोहक थी(बेहतरीन द्रश्यांकन),मेज़बानों ने बङी ग़र्मजोशी से स्वागत किया ( सारे कलाकारों का अभिनय प्रशंसनीय है, खासकर रणबीर और बिपाशा, हितेन पेण्टल इस फिल्म की बेहतरीन खोज है और किस्मत बुलंद रही तो बेशक स्थापित होंगे), बेहतरीन ख़ानसामे बुलाये गये(जाने माने निर्देशक 'सलाम-नमस्ते' और 'तारारमपम' फेम सिद्धार्थ) खानदान तो है ही नामी ग़िरामी ( चोपङा बैनर) , लेकिन फिर भी स्वाद फीका ही रह गया।कुल मिलाकर फिर अपना वही पुराना जुमला दोहराने का दिल करता है 'आत्माहीन सौंदर्य,और स्वाद रहित माधुर्य' है, यदि हाल ही के सालों में 'जब वी मेट' 'तारे ज़मीं पर' 'जाने तू...' न आयीं होती तो हम मानना शुरु कर चुके थे कि समय के साथ हमारे 'इमोशन्स' ही 'ड्रेन आऊट' हो चुके हैं,कितनी भी हाई डोज़ दो फर्क नहीं पङेगा, लेकिन उदाहरण सामने हैं, जो मानसिक संबल देते है, कि वैचारिक सरलता और अभिव्यक्ति की सहजता अभी भी संबध बना लेती है, दर्शकों से :

हमें आँसुओं की उम्मीद है,

न अगर खुशी के,तो ग़म के ही,

कहीं सूख के न फट पङे,

दिल में पङ गयी जो दरार सी।

'रूपक'

Friday, August 15, 2008

आओ सेण्टियाप मचाएं...






हम आज फिर भावुक हो लिये, भावुक अर्थात 'इमोशनल' जिसका तद्भव चल रहा है 'सेण्टी मारना' 'सेण्टी होना' और न जाने क्या क्या क्रियाएं लगाकर 'सेण्टी' शब्द की फजीहत की जा रही है, पहले तो ये था कि सेण्टित्व का भी एक वातावरण होता था, नदी का शांत किनारा, कमरे का अँधेरा कोना, ट्रेन का लम्बा सफर, यानि पूरा मूड बनाकर 'सेण्टी' हुआ जाता था, लेकिन आज न वो मौके रहे न वो दस्तूर हाँ 'सेण्टी होना' बदस्तूर जारी है, वर्क स्पेस में 'सेण्टी' होना 'इण्टेलिजेन्सी' हो गया है,बात बात पर 'सेण्टी मारना' कूल होने की निशानी बन गया है, ज़रा पूछ परख हुई तो आवेग में दूसरे पूछते फिरेंगे ' आज कल तो मस्त सेण्टियाप मचा रखा है!' ; खैर अब सफर में,नदी किनारे,या अँधियारे न कुछ 'सेण्टी' होता है न 'मेण्टल' बशर्ते कुछ डिपार्टमेण्टल होता दिख जाये तो आप 'सेण्टी' मत हो जाना।


चलो 'सेण्टी' की 'आईडेण्टिटी' तो बता ही दी , अब ये भी बता दें कि हम 'सेण्टी' क्यों हो गये; कुछ मौके ऐसे होते हैं कि हम पुनरावलोकन करने लगते हैं, 'मैं क्या ?हूँ' 'मैं क्यों हूँ?' 'मैं कौन हूँ?' प्रश्नवचन के इतने प्रहार कि 'क' शब्द से 'करण' 'एकता' या 'रोशन' को भी कब्ज़ियत हो जाये; शुरुआत होती है शुरु से , यानि कि 'नया साल' साल दर साल सवाल दर सवाल, 'क्या किया?' 'कहाँ थे?कहाँ आ पहुँचे?''क्या करें?''कब तक?' 'कैसे?' और न जाने 'क्या क्या....' फिर समय का पहिया घूमता है, आता है जन्म दिवस और सवालों की झङी इस बार मानकों के साथ 'इतने साल के हो गये़!!क्या किया??' 'कितना वक्त बचा अब?' 'फलाँ ने तो अब तक ये कर डाला था' और हम...???';लानतों और उलाहनाओं के सिलसिले...केक पर रखी क्रीम पिघलती है, मोमबत्ती की लौ धुआँ बनकर हवा हो जाती है,समय का पहिया घूमता है,इस बीच हर लंबे सफर में तात्क्षणिक कसमसाहट काबिज़ हो ही जाती है 'करने,'न कर पाने' और 'कर दिखाने' की 'करकराहट' कचोटती है। और भी मौके हैं , 'किसी की मैयत से लौटने पर मन में उपजा वैराग्य' 'जोङ जोङ कर जमा किया अचानक लुट जाय या खर्च करना पङ जाय तो 'खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जायेंगे गुनगुनाना' या लाखों में एक-आद को 'बुद्ध''महावीर' अशोका' की तरह 'सत्य का ग्यान' भी हो जाता है कभी कभी , अब ये ग्यान 'SPIRIT' से उपजा या 'SPRITE' से ये तो समय की कसौटी पर कसना पङता है, इन सब 'करकराहटों' के बीच कुछ प्रश्न 'स्व' की सीमा पार कर जाते हैं, वो 'जन''जाति' 'समाज' राष्ट्र''विश्व' के हो जाते हैं, कारक कुछ भी हो सकता है, हाल ही में 'लेजेण्ड ऑफ भगत सिंह' या 'स्वदेस' देख ली हो,या कोई देशभक्ति का आर्टिकल 'देख' 'पढ' 'सुन' लिया हो, या फिर कोई राष्ट्रीय त्यौहार हो जैसे कि '१५ अगस्त'...सवाल वही बस कटघरा बङा हो जाता है, सब जिरह करते हैं पर आरोपी कोई नहीं होता, कटघरे में होते हैं 'नेता' 'सरकार' 'इतिहास बनाने वाले'...न न अगर आप सोच रहे हैं कि अब मैं क्रांतिवीर होने वाला हूँ तो रुकिये, वो सब नहीं बोलूँगा, तो भाई सवाल होते हैं 'देश''समाज''सरकार' पर, पर घूमकर आ जाते हैं खुद पर, और फिर वही 'करकराहट' और 'कसमसाहट' 'काश....मैं ये होता''काश...ये करता' 'काश की लाश पर हताश अरमानों के फूल चढायें जाते हैं,काश के पाश में बँधे 'निराश' से बस 'सेण्टी' हो जाते हैं, चलिये एक काश की ताश हम भी खेलकर देखते हैं:


काश...ऊँगली,अँगूठा होती?


"रास्ता दिखाने वाले,लोगों को अँगूठा दिखाते नज़र आते, ऊँगली उठाने वाले अँगूठा उठा उठा कर 'बेस्ट ऑफ लक' कहने लगते, मतलब 'अच्छे' 'बुरे' और 'बुरे' 'अच्छे' काम करने लगते'...ये तो रहा मेरी काश की ताश का पहला पत्ता,


अब आप की कोई हसरत हताश करती हो,


हर मोङ पर काश काश...करती हो,


तो बयान कर ही डालिये,'आओ मिलकर सेण्टियाप मचाते हैं...


'रुपक'
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