Tuesday, November 16, 2010

महाविकट औंघाई

Image Courtesy:http://www.clipartof.com/details/clipart/12165.html)

(परसाई जी ने अपने प्रसिद्ध व्यंग्य में 'निंदा रस' को सबसे उच्च स्थान दिया है,किंतु उससे भी अधिक सम्मोहित करने वाला रस है 'निद्रा रस', हममें से हर कोई बहुधा इसकी चपेट में आ ही जाता है,तब 'निद्रा-रस' के पाश में आने वाले की जो मानसिक व शारीरिक दशा होती है उसी का वर्णन करता है 'बघेली' भाषा में लिखा गया यह छंद,'बघेली' उत्तर-पूर्वी मध्य-प्रदेश मे बोली जाने वाली बोली है,रीवा,सतना,शहडोल,सीधी और अंचल के अन्य जिले इस बोली का प्रतिनिधित्व करते हैं,रचना में बघेली भाषा के सुने हुए शब्दों का प्रयोग किया गया है अतः संभावित व्याकरण त्रुटि के लिये रचनाकार क्षमाप्रार्थी है सुधार के लिये टिप्पणीयों का सहर्ष स्वागत है)
 
महाविकट औंघाई
 
मूङ* तऊ पिरात*, रात मा अघात* भर लगी,
आँखि मुँदर जात,छीँट-छीँट भर दिहेन नदी,
चार ठे मनई* दिखैं हजार के बरात कस,
बिरबा* कस झूम रहेन,हमका बिन पिये चढी।
 
टूटि गै तमाम देह,फुरिन* कहेन राम देह,
दानव बन देह मा समाई,
जम्हाई के जमाई महाविकट औंघाई*।

जैसन भन्नात मूङ,लप्पङ* पा जात मूङ,
फेरौ लङियात मूङ,जिद्दी जल्लाद मूङ,
सोन चाँदी रुपिया पैसा सबका लगा सतैसा*,
चूल्हबा मा जाय धमाई,
दानव बन देह मा समाई,
जम्हाई के जमाई महाविकट औंघाई।
 
तजबीज* लै बिहन्ने* से, राति से सकन्ने* से,
कूकुर* चौकन्ने से,दिद्दा*,बूटू*,मुन्ने से,
सोयेन पसार गोङ*,बेच के हजार घोङ,
जिउ के जेऊनार* नॆ लगाई,
दानव बन देह मा समाई,
जम्हाई के जमाई महाविकट औंघाई।
 
सेंत* बिल्लियाबा* ना,संचे* होय जाबा ना,
खोतङी* खजुआबा ना,दरबारै लगाबा ना,
'रुपक' वा रोमय* से ना जाई,
जना दानव के घोटकी* चपाई*,
 
दानव बन देह मा समाई,
जम्हाई के जमाई महाविकट औंघाई।
'रुपक'
(बघेली शब्दार्थः:
मूङ-सर-head;पिरात-दर्द-pain;अघात-संतोषजनक-more than enough;मनई-लोग-people;बिरबा-पेङ-tree;फुरिन-वास्तव मे-really/I swear;औंघाई-निद्रा-feeling sleepy/sleeping (v);लप्पङ-तमाचा-slap;सतैसा-एक प्रकार का अपशकुन-jinx;तजबीज-पूछ-ताछ-enquiry;बिहन्ने-सुबह-morning;सकन्ने-सुबह-morning;कूकुर-कुत्ता-dog;दिद्दा-दादी-grand mother,बूटू-छोटी बच्ची-little girl;गोङ-पैर-legs;जेऊनार-दोपहर का खाना-lunch;सेंत-अकारण-unnecessarily;बिल्लियाबा-परेशान होना-worrying;संचे-शांत-pacify;खोतङी-खोपङी-skull/head;रोमय-रोने से-crying;घोटकी-गला-neck;चपाई-दबाना-pressing forcefully;)

Friday, October 1, 2010

लो झंडु बाम हुए,बाबरी* तेरे लिये..


कुछ भी नहीं हुआ,कभी-कभी कुछ न होना भी पीङा देता है,मीडिया और सरकार ने आशंका का ऐसा वातावरण बना दिया कि कुछ न होना सालने लगा,भारत-पाकिस्तान के विश्व कप फाईनल जैसा रोमांच था,दफ्तर खाली,सङकें खाली स्कूल बंद,टी वी पर चिपके लोग,रोमांच का चरम,धैर्य की परीक्षा,प्रतीक्षा की पराकाष्ठा....और कुछ नहीं हुआ, विवादित की बंदर बाँट में सारे बंदर 'V' बानाकर नाचने लगे,कहीं किसी पेङ पर बैठे 'राम लखन सीता मन बसिया' खिसिया अवश्य गये होंगे विचित्र व्यवहार से।
सभी याचिकाकर्ता ३३ प्रतिशत अंको से उत्तीर्ण हो गये कोई मेधावी न रहा,समरसता ने नीरसता को जन्म दिया और नीरवता पंख फैलाने लगी,कुल मिलाकर कुछ भी नहीं हुआ।
राजनीति में मुर्दे उखाङने के लिये ही गाङे जाते हैं,मुखर क्रांतिकारी संयमित प्रतिक्रिया दे रहे हैं,उनका मन मुर्दों के पुनर्जन्म की उधेङबुन में लगा है,मुर्दा जो जब क़ब्र से निकलेगा अपने साथ सैकङों को लेकर जायेगा,ज़मीन के नीचे   इमारत के अवशेष हैं और दिमाग के नीचे मुर्दों के,भूमिगत खण्डहर पढे जा सकते हैं,जातिगत खण्डहर नहीं;
कुछ हास्य मिश्रित प्रतिकार रस वाली प्रतिक्रियाऐं बाँटने का मन कर रहा है "यदि अजमल क़सब ताज में क़ब्ज़ा करके 300  वर्ष तक उपासना करता रहे तो क्या ताज उसका हो गया?" "बाबर को हम अपना पूर्वज नहीं मानते वो एक बर्बर शासक था और बहुत सारे धर्म विरुद्ध कार्य किये" ( सोर्सः विभिन्न चिठ्ठो पर प्काशित टिप्पणियाँ)
एक जिम्मेदार और सर्वाधिक प्रचलित अंग्रेज़ी समाचार पत्र की हेडलाईन थी " विवादित भूमि का दो हिस्सा हिंदुओं का एक हिस्सा मुस्लिम का" फैसला आने से अब तक यही एक ऐसी लाईन थी जो चीख-चीख कर उकसा रही थी "कुछ भी नहीं हुआ..कुछ तो हो"
"जनता समझदार है"सब यही बोलते दिखे, और मुँह मे माईक ठूँसकर पूछे कई सवाल,सारे सवालों का भावार्थ एक ही था"आपको गुस्सा नहीं आ रहा है? नहीं तो क्यों नहीं? कब आयेगा गुस्सा?आना तो अवश्यंभावी है , देखते हैं कैसे नहीं आयेगा़!!"
स्वप्न और रोमांच नीरस जीवन में चटखारा लगाते हैं,भारतवर्ष समारोह का आदी होता जा रहा है,समारोह प्रसन्नता का हो या विषाद का,कर्मठता का या उन्माद का,स्वयं का या पङोसी का, कुछ होना चाहिए,कुछ न होना सालता है,नीरसता डसती है,आत्मंथन करवाने लगती है,स्वयं की किसे पङी है,अपने बारे में कल भी सोच लेंगे,या अगले जनम में, आज तो गाते हैं:
 

हिस्सों मे राम हुए,बाबरी* तेरे लिये,
लो झंडु बाम हुए,बाबरी तेरे लिये,
 

हिस्सों के ठाट नवाबी,शोर-शराबी,इंक़लाबी रे,
हँस के हज़्ज़ाम हुऐ,बाबरी तेरे लिये,
 

लो झंडु बाम हुए,बाबरी तेरे लिये,
'रुपक'

(*क्रपया बाबरी का शाब्दिक अर्थ न लें,यहाँ तात्पर्य विवादित स्थल से है,यह तटस्थ पोस्ट है और किसी पक्ष का समर्थन नहीं करती,पढें और निर्धारित करें।)

Saturday, August 28, 2010

आरज़ू अनंत,मन घुमंत

आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार,
है जो मिला,चलो मिला,न जो मिला,न क्यों मिला?
ख्वाहिशें ज्वलंत,भींचे दंत,कर रहा गुहार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
खोपङी की खाट में विराट जाल बुन गया,
खु़द की सोच सङ गयी,खु़द का मान घुन गया,
कॉपियाँ अनंत,कर तुरंत, बस रहा उतार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
अकबका गया ये,भकभका गया,गया जो कुछ,
म्यूज़ियम बना,हुआ न चार दिन नया जो कुछ,
बार-बार चीत्कार,और-और की पुकार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
ताक रख दिया है सच,झूठ बोलता है सच,
किरकिरे करे मेरे मज़े तो कुङकुङा है सच,
सत्य जामवंत,हनुमंत खोलता न द्वार,आज भी इसे है इंतज़ार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
 
ख़याल तितलियाँ रहे,तो लब्ध फूल सा रहे,
सुवास आस बन चले,प्रयास सूखता रहे,
शून्य से अनंत,बस भिङंत और धाङ-मार,कर न 'रुपक' ऐसा अत्याचार,
आरज़ू अनंत,मन घुमंत बङा बेक़रार आज भी इसे है इंतज़ार।
रुपक

Saturday, June 19, 2010

मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल


जज़्बाती बुलबुला गया, नाहक ही चुलबुला गया,
कहने को तिलमिला गया ये दिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

उस ओट में उजास थी , जहाँ अनमनी उबास थी,
बिंदास बदहवास बेमंज़िल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

चंपाकली के गाँव के गुलशन में हैं ग़ुलाब,
तेज़ाब आब हो गई, पानी हुआ शराब,
जुही चाँदनी में जल गई, सूरज में गई खिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

अरमान धूप में पङे,छत पर सुखाते बाल,
मुँह तल्ख़ियों के है दही,ख़्वाहिश बनी कव्वाल,
सब टाँट गाँठ बाँध के जुमला दिया उछाल,
गंभीर,गूढ मंत्रणा,बनवा रही है WILL,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

बत्तिस तरह के टोटके,छत्तिस तरह के डर,
आये न वक़्त लौट के ,चौंतिस दफा़ फ़िकर,
बाइस छटाक के बचे,आधी बची उमर,
चौबीस घण्टियाँ रहे, पच्चीस की कसर,
ताने पचास बार के , सत्रह दफा़ VIGIL,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

रद्दोबदल के दौर,बिछाते हुये लपेट,
जल्दी समेट फ़लसफे़ सब हो रहे हैं लेट,
आये ज़माने TWEET के, पकङे है तू सलेट,
वो पेट पेट ही नहीं जिसकी शकल न NET,
झकलेट! फिर भी आ गया,अनुबंध की चपेट,
'रुपक' हुआ बुरा,लिया चुरा,किया जटिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।

जज़्बाती बुलबुला गया, नाहक ही चुलबुला गया,
कहने को तिलमिला गया ये दिल,
मुश्किल,हुई मुश्किल,हुई मुश्किल।
'रुपक'

Saturday, June 12, 2010

हीलियम के हम ग़ुब्बारे


काँच,कीलें,पिन नुकीले,धूर्त धरती,छत,दीवारें
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे;

सब हमें ही ताकते हैं,साधते हम पर निशाना,
वो ज़माना लद गया , आसान था जब पार पाना,
जन्म से वो 'खल' मैं 'नायक' , वो 'कमीने' हम 'बेचारे',
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे;
 
साँस तक उनकी विषैली , सुन न लेना बात मैली,
है पहेली चाल उनकी,पुतलियाँ निर्मम कुचैली,
वो सँङाँधी खुले गठ्ठर, हम ज़वाहराती पिटारे,
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे,

कुछ ग़ुब्बारे भी नुकीले,ज़िस्म उग आयी हैं कीलें,
रंग धूसर,सुस्त उङानें,आ के मेरी ख़ाल छीलें,
भयाशंका, दगा़ शंका, हवा की नज़रें उतारें,
जल रहे धू-धू अंगारे,हीलियम के हम ग़ुब्बारे,

ऐ ग़ुब्बारे फूट जाना, ज़िस्म न पाना नुकीला,
रंग धूसर, सुस्त उङानें, क्षितिज का अरमाँ लचीला,
या कि 'रुपक' उङा करना, आस की डोरी सहारे,
हमको बस दिखते हैं तारे, हीलियम के हम ग़ुब्बारे।
 
रुपक

Friday, June 4, 2010

"मत-लब" की कुछ बात



तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात,
सन्नाटे!भन्नाते रहना, झींगुर वाली रात।
गहन-मनन में शून्य न होगा, होगा एक विचार,
कुंठा का उपचार करेगा,परामर्श का सार,
कुकुरमुते,बुदबुदे न होंगे पल-प्रतिपल जज़्बात;
तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात।

विगत दिवंगत पूज्य न होगा, न 'क्या था' न 'काश',
न ढाँढस का च्यवनप्राश,न धीरज भरी गिलास,
निरा-ढीठ,निर्लज्ज,निरादर कर काढेंगे दाँत;
तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात।

जब निषेध से निर्मम होता जायेगा परिणाम,
तब अंजाम भयंकर,होगा महाघोर संग्राम,
साँप छंछूदर वाले होते जाएंगे हालात;
तन्हाई से आज करेंगे,मतलब की कुछ बात।

तन्हाई वाले जप-तप में,'रुपक' नहीं समर्थ,
निर्विचार का, निराकार का,बङा गूढ है अर्थ,
अहं 'अहम' बातों का,ये बस है "मत-लब" की बात,
सन्नाटे!भन्नाते रह न! झींगुर वाली रात।
'रुपक'



Monday, March 22, 2010

उनका रुधिर उबलता होगा?


करतल ध्वनि, ललायित चेहरे, मनस पटल पर चलता होगा,
जो इतिहास मिटाते लिखते, उनका रुधिर उबलता होगा?


क्या विक्षुब्ध न होते होंगे? भाग्य-भाग्य न रोते होंगे?
या फिर देन ईश की कह दूँ, वो विशेष ही होते होंगे,
किस टकसाल ढले ? किस धातु ? जिनका सिक्का चलता होगा,
जो इतिहास मिटाते लिखते, उनका रुधिर उबलता होगा?


अवरोही अवलोकन कर्ता,करता चित्र शिखर संदर्भित ,
कैसे मानूँ उसी कथा को, जिसका सारगर्भ ही गर्वित;
अर्पित कर दूँ तर्क मैं; ताकि न प्रतिमान हो किंचित विचलित,
या कुतर्क में झोंक रहा हूँ, सत्य न हो जिससे परिलक्षित,
"निर्विचार" कर फिर विचार, क्या उदर कण्ठ तक जलता होगा ?
जो इतिहास मिटाते लिखते, उनका रुधिर उबलता होगा?


नहीं जपूँगा तेरी माला , क्यूँ पदचिह्न चलूँ तेरे,
क्या ये सब इसलिये किया था ताकि क्लोन बनें तेरे,
मुझे अँधेरे में रहने दो, कहने दो हत-उत्साहित,
क्या उत्साह है गाने में पर-शौर्य कथा होकर विक्षिप्त,
मुझसे न सँभले तेरा यश, तुझसे कहाँ सँभलता होगा।
जो इतिहास मिटाते लिखते, उनका रुधिर उबलता होगा?


तुम मुझसे 'यलग़ार' न कहना, तार-तार उत्तर दूँगा,
कीर्तिमान हो़! तू महान हो! मैं प्रचार भर कर दूँगा,
भर दूँगा मैं कान उन्हीं के, जीत तुम्हारी जीते जो,
मैं नैपथ्य करूँ पुरुषार्थ,वो करतल मुदित भले न हो,


पथ,प्रशस्त, आश्वस्त न होगा, 'रुपक' जिस पर चलता होगा,
जो इतिहास मिटाते लिखते, उनका रुधिर उबलता होगा?

'रुपक'

Monday, February 8, 2010

लाल-बत्ती/हरी-बत्ती


हङबङाहट,चिङचिङाहट,छटपटाहट,ज़बरदस्ती;
टुकङा-टुकङा,शहर सिकुङा, "लाल-बत्ती/हरी-बत्ती"।

घोसले से चोंचले देखे,तो चाहत थी बङी,
पंख फूँको शंख शक्ति का,वहाँ मंज़िल खङी,
दलदली दल, चल चले चल, सर झुका, है सरपरस्ती;
धुंध,धूलें,धूप,रातें, "लाल-बत्ती/हरी-बत्ती"।
टुकङा-टुकङा,शहर सिकुङा, "लाल-बत्ती/हरी-बत्ती"।

नीर निर्मित,चीर निर्मित,क्रोध निर्मित,धीर निर्मित,
फैक्ट्री पग-पग हुआ,पल-पल हुआ जो सिर्फ़ निर्मित,
शक्ल 'पुर्ज़ा है' ,'मशीनें' घनी-बस्ती-बङी-बस्ती
जीविका वाहन,बचत Throttle, Decision "लाल-बत्ती/हरी-बत्ती";
टुकङा-टुकङा,शहर सिकुङा, "लाल-बत्ती/हरी-बत्ती"।

खूँटियों पर खूँटियाँ,सब टँगे,लटके,लदे,फिसले,
क़ब्र तक टाँग आये होंगे,फ़ैसले अगले जनम के,
उठा पुठ्ठा, हँसो झुठ्ठा, मार 'रुपक' को दुलत्ती,
भेङ चालें बस समझतीं, "लाल-बत्ती/हरी-बत्ती";
हङबङाहट,चिङचिङाहट,छटपटाहट,ज़बरदस्ती;
टुकङा-टुकङा,शहर सिकुङा, "लाल-बत्ती/हरी-बत्ती"।

'रुपक'

Saturday, January 9, 2010

बेतरतीब


अंगुर-अंगुर, भंगुर-भंगुर, झींगुर-झींगुर झन्नाटा
कतरा-कतरा, पसरा-पसरा,बिखरा-बिखरा सन्नाटा।

बढते-बढते, चढते-चढते, लुङके-लुङके चित्त पङे,
उजले-उजले, पिघले-पिघले, बिखरे-बिखरे चित्र बङे।
पस्त-पस्त फिर सुस्त-सुस्त फिर ज़बरदस्त एक फर्राटा,
कतरा-कतरा, पसरा-पसरा,बिखरा-बिखरा सन्नाटा।

कब? क्यों? कैसे? कितना? कब तक?
किट-किट ,झिक-झिक,झक-झक,बक-बक,
अनदेखी,तिरछी देखी,फिर देखी अपलक टक-टक,
रोता होता सोता सोता, खुली आँख का खर्राटा।
कतरा-कतरा, पसरा-पसरा,बिखरा-बिखरा सन्नाटा।

ढुलका-वुलका,हल्का-हल्का,ढाँढस-वाँढस आशाऐं,
तने-तने,फिर बने-बने, फिर राहें-वाहें भरमाऐं।
चंचल,चतुर,चपल चित चेहरे पर चाहे चित्रित चाँटा,
'रुपक' बेतरकीब , ख़याल अजीब
कि क्यूँ 'बेतरतीब' सा ये लम्हा बाँटा।

अंगुर अंगुर, भंगुर भंगुर, झींगुर झींगुर झन्नाटा
कतरा कतरा, पसरा पसरा,बिखरा बिखरा सन्नाटा।

रुपक

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